वहीं यमुना जिए अभियान के संयोजक और पूर्व आईएफएस अधिकारी मनोज कुमार मिश्रा ने सरकार के इस कदम को बिल्कुल सही बताया है। उनका कहना है कि सरकार के इस कदम से समस्या तो हल तो नहीं होगी, लेकिन इससे जवाबदेही और जिम्मेदारी तय होगी। आज के वक्त में कौन कितना भूजल प्रयोग कर रहा है इसके कोई रिकॉर्ड या आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं। सरकार को चाहिए कि एनओसी में भूजल के सीमित उपयोग का भी प्रावधान होना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार को इसके साथ निगरानी की व्यवस्था भी करनी चाहिए और नियम कानूनों को ताक पर रखने वाले प्रोजेक्ट्स के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।
इससे पहले 24 अक्तूबर को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने भूजल उपलब्धता मामले की सुनवाई के दौरान केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण की जमकर खिंचाई की थी। एनजीटी ने आदेश का पालन नहीं करने पर अवमानना का मामला मानते हुए कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी और जल संसाधन मंत्रालय के सचिव को 12 नवंबर को पेश होने का आदेश दिया था।
वहीं सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इस साल जून में 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक' रिपोर्ट जारी करते हुए कहा था कि साल 2020 तक दिल्ली, बेंगलूरु, हैदराबाद और चेन्नई समेत 21 शहरों में भूजल पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और इन शहरों के 10 करोड़ लोगों को पीने का पानी मुहैया नहीं होगा। नीति आयोग के मुताबिक 75 फीसदी घरों में पीने के पानी नहीं है, वहीं 70 फीसदी पानी प्रदूषित है। रिपोर्ट में जिक्र था कि इस समय देश की 60 करोड़ आबादी जल समस्या से जूझ रही है, और हर साल करीब दो लाख लोग साफ पानी की कमी के चलते मौत के शिकार हो जाते हैं।