इसी तरह की कहानी छत्तीसगढ के एक विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग करने वाले वीरेंद्र सिंह की है। उसने नौ साल की उम्र में उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर के गेराज में क्लीनर के तौर पर काम करना शुरू किया और 2006 में संगठन ने उसे मुक्त कराया। सिंह ने नौ साल की उम्र तक स्कूल की शक्ल तक नहीं देखी थी।
सुमेधा ने बताया कि सिंह को मुक्त कराने के बाद उसके माता-पिता को समझाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी जिसके बाद वे सिंह को बाल आश्रम भेजने को तैयार हुए। इसके बाद कुछ वक्त तक उसे अनौपचारिक शिक्षा दी गई है और फिर चौथी कक्षा में दाखिला दिला दिया गया।
उन्होंने बताया कि सिंह पढ़ाई में काफी होनहार था और इसका नतीजा ही रहा कि उसने ओपी जिंदल विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री ली। सिंह ने बताया कि वह फिलहाल नौकरी की तलाश में है और उसकी एमटेक करने की तमन्ना है।
जाटव बाल मजबूरी और मानव तस्करी की वजह शिक्षा और आर्थिक तंगी को मानते हैं। वह कहते हैं कि मेरे हिसाब से शिक्षा की कमी की वजह से माता-पिता अपने बच्चों को काम पर लगा देते हैं।
भले ही इसके पीछे मुख्य कारण आर्थिक तंगी हो, लेकिन अगर माता-पिता को शिक्षा की अहमियत पता होगी तो वे बच्चों को काम पर लगाने के बजाय पढाएंगे। सिंह ने कहा कि बाल मजदूरी और बंधुआ मजदूरी रोकने के लिए सबसे अहम है कि शिक्षा का ज्यादा से ज्यादा प्रसार हो, जिससे लोगों में जागरूकता आए।