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Bombay High Court: अदालत ने छोड़े गए बच्चों को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मामले पर की सुनवाई, कही बड़ी बात

Fri, 28 Jul 2023 06:36 PM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर महाराष्ट्र सरकार को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के लिए छोड़े गए बच्चों के साथ अनाथ बच्चों के समान व्यवहार करने का निर्देश दिया गया, तो यह परित्याग को प्रोत्साहित कर सकता है।
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बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को छोड़े गए बच्चों को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मामले पर सुनवाई की। हाईकोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर महाराष्ट्र सरकार को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के लिए छोड़े गए बच्चों के साथ अनाथ बच्चों के समान व्यवहार करने का निर्देश दिया गया, तो यह परित्याग को प्रोत्साहित कर सकता है, जिसमें खासकर लड़कियां हो सकती हैं।

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न्यायमूर्ति गौतम पटेल और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने कहा कि एक संतुलन बनाया जाना चाहिए क्योंकि राज्य सरकार छोड़े गए बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट रही है। अदालत एक एनजीओ नेस्ट फाउंडेशन और दो वयस्क परित्यक्त लड़कियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अनाथ बच्चों को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ देने वाले सरकारी प्रस्ताव को चुनौती दी गई थी। याचिका में मांग की गई कि लाभ परित्यक्त बच्चों को भी दिया जाए।

अदालत एक एनजीओ नेस्ट फाउंडेशन और दो वयस्क परित्यक्त लड़कियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अनाथ बच्चों को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ देने वाले सरकारी प्रस्ताव को चुनौती दी गई थी। याचिका में मांग की गई कि लाभ परित्यक्त बच्चों को भी दिया जाए।
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याचिकाकर्ता के वकील अभिनव चंद्रचूड़ ने शुक्रवार को अदालत को बताया कि एक अनाथ बच्चे और छोड़े गए बच्चे के बीच कोई अंतर नहीं है। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम कोई वर्गीकरण नहीं बनाता है तो राज्य सरकार वर्गीकरण क्यों बना रही है। 

महाधिवक्ता बीरेंद्र सराफ ने अदालत को बताया कि अगर परित्यक्त बच्चों को प्रस्ताव के दायरे में शामिल किया जाता है, तो इससे ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जहां बच्चों को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाएगा ताकि उन्हें किसी संस्थान में प्रवेश का बेहतर मौका मिल सके। सराफ ने कहा कि अनाथालय एक सच्चाई है, लेकिन परित्याग किया जा सकता है, ऐसा होता है... यह दुखद सच्चाई है। सरकार ऐसी स्थिति पैदा नहीं करना चाहती है।

पीठ ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि यह हमारी भी चिंता है। इससे विशेषकर बच्चियों के परित्याग को बढ़ावा मिलेगा। हमें संतुलन तलाशने की जरूरत है। न्यायमूर्ति पटेल ने कहा कि हमारे सामने ऐसे भयावह मामले आते हैं जहां बच्चों को रेलवे स्टेशनों पर छोड़ दिया जाता है। फिर ऐसे बच्चों को राज्य संचालित आश्रयों में ले जाया जाता है। राज्य सरकार ऐसे बच्चों की देखभाल की अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट रही है।

सराफ ने कहा कि सरकार ऐसे बच्चों की 18 साल की उम्र तक देखभाल करेगी। उन्होंने कहा कि सरकार परित्यक्त बच्चों को आरक्षण नहीं दे सकती। हर किसी को आरक्षण नहीं दिया जा सकता। आरक्षण पूरी तरह से सरकार का नीतिगत निर्णय है।

ट्रांसजेंडरों, समलैंगिकों से निपटने को लेकर महाराष्ट्र पुलिस मैनुअल में संशोधन किया जा सकता है
बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को जानना चाहा कि क्या ट्रांसजेंडर और समलैंगिक व्यक्तियों से निपटने के तरीके के बारे में पुलिस बल को संवेदनशील बनाने के लिए महाराष्ट्र पुलिस मैनुअल में संशोधन किया जा सकता है।  न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति गौरी गोडसे की खंडपीठ ने जेलों में बंद ट्रांसजेंडर और समलैंगिक व्यक्तियों के इलाज के संबंध में समाधान खोजने के लिए महाराष्ट्र के महानिरीक्षक (जेल) से भी सुझाव मांगे।

अदालत एक समलैंगिक जोड़े द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें रिश्ते पर आपत्ति जताते हुए उनके माता-पिता में से एक के द्वारा दर्ज की गई गुमशुदगी की शिकायत के मद्देनजर सुरक्षा की मांग की गई थी।  पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने युगल के वकील विजय हिरेमथ से पूछा था कि क्या इस मुद्दे पर कोई दिशानिर्देश तैयार किया जा सकता है।

हिरेमथ ने शुक्रवार को अदालत को सूचित किया कि मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष इसी तरह के एक मामले में, पारित आदेशों के बाद, तमिलनाडु की केंद्रीय जेलें अपने सदस्यों की मदद से LGBTQIA+ समुदाय के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम आयोजित कर रही थीं।
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