बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पिता की हत्या के दोषी 35 वर्षीय एक युवक की सजा निलंबित करते हुए उसे जमानत दे दी। दरअसल युवक ने अदालत को बताया कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ है और सिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से पीड़ित है। इसके बाद न्यायमूर्ति भारती डांगरे और मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने 12 दिसंबर को दिए अपने फैसले में युवक को जमानत देने का आदेश दिया। युवक ने अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
कोर्ट ने कहा- मानसिक बीमारी इंसान के सोचने की क्षमता को प्रभावित करती है
कोर्ट ने कहा कि दोषी व्यक्ति के सिजोफ्रेनिया बीमारी से ग्रस्त होने का पता चला था, जिसके चलते वह साइकोट्रोपिक दवा ले रहा था। उच्च न्यायालय ने कहा कि 'मानसिक स्थिति की जांच से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि वह लगातार खुद से बड़बड़ाता रहता है और उसका मूड स्विंग होता रहता है। इससे उसकी निर्णय लेने की क्षमता कम हो गई।' पीठ ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसी स्थिति है जो लोगों को जीवन के तनावों से निपटने, अपनी क्षमताओं को पहचानने, सीखने और अच्छी तरह से काम करने में सक्षम बनाती है।
अदालत ने कहा, 'भारत जैसे देश में, जब लोग अभी भी मानसिक बीमारी के बारे में खुलकर चर्चा करने से कतराते हैं और इसे उजागर करने के बारे में खुले तौर पर नहीं बोलते हैं, क्योंकि इसे एक सामाजिक कलंक माना जाता है, इससे सामाजिक बहिष्कार या भेदभाव की आशंका होती है, तो यह माना जाना चाहिए कि वह व्यक्ति, जिसने अपने पिता की हत्या की है और उसे स्वीकार भी किया है, उसे मानसिक बीमारी थी।
2010 से सिजोफ्रेनिया की दवाई ले रहा था
अदालत ने कहा कि 'दोषी व्यक्ति उच्च शिक्षित था और उसने साल 2010 में उसने अपनी मानसिक बीमारी के लिए चिकित्सा उपचार लेना शुरू किया था। ऐसा लगता है कि उसका उपचार या तो बंद कर दिया गया था या उसमें लापरवाही हुई, जिसके चलते उसने अपने ही पिता की हत्या कर दी।' हाई कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह माना जाता है कि ट्रायल कोर्ट आरोपी की मानसिक बीमारी पर विचार करने में विफल रहा है।
पीठ ने उसे जमानत देते हुए उसकी बहन से एक हलफनामा मांगा जिसमें अदालत को आश्वासन दिया जाए कि वह अपनी मानसिक बीमारी का इलाज जारी रखेगा ताकि वह किसी और के लिए खतरा पैदा न करे और अगर जरूरत हो तो उसे मानसिक स्वास्थ्य देखभाल संस्थान में भर्ती कराया जाएगा। व्यक्ति को 2015 में पुणे की एक सत्र अदालत ने अपने पिता की हत्या के लिए दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उसके वकील सत्यव्रत जोशी ने हाई कोर्ट को बताया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की मानसिक स्थिति पर विचार नहीं किया।