बॉम्बे हाईकोर्ट की एक तीन सदस्यीय पूर्ण पीठ ने शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसले में पोक्सो कानून के तहत सजायाफ्ता (दंड पाया हुआ या दंडित) मुजरिम को आपातकालीन पैरोल पर रिहा करने से इनकार कर दिया। पीठ ने अपने फैसले में कहा, लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम (पॉक्सो कानून) के तहत दोषी घोषित व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर इमरजेंसी पैरोल नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कोविड-19 (कोरोना वायरस) के कारण जेलों में बंदियों की संख्या घटाने का आदेश दिया था।
पूर्ण पीठ ने दिया ऐतिहासिक फैसला, कोरोना वायरस से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर मांगी थी रिहाई
जस्टिस केके तातेड, जस्टिस जीएस कुलकर्णी और जस्टिस एनआर बोरकर की पूर्ण पीठ एक कैदी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो फिलहाल पॉक्सो कानून के तहत दोषी साबित होने के बाद महानगर की एक जेल में 10 साल की सजा काट रहा है। यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याची के वकील एडवोकेट रूपेश जायसवाल की तरफ से इस मुद्दे पर दो आपस में भिन्नता रखने वाले फैसले पेश करने पर पूर्ण पीठ को रेफर कर दी थी। ये फैसले बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर और औरंगाबाद पीठों की तरफ से दो अलग-अलग मामलों में दिए गए थे।
पीठ ने कहा, हालांकि महाराष्ट्र कारागार नियमावली का नियम-19 में पॉक्सो कानून खासतौर पर शामिल नहीं है। लेकिन 2012 का यह कानून विशेष कानूनों और गंभीर अपराधों के तहत आता है, जो कोविड-19 प्रसार के आधार पर इमरजेंसी पैरोल के दायरे से बाहर हैं। पीठ ने यह स्पष्टीकरण राज्य के गृह विभाग की तरफ से जारी अधिसूचना का हवाला देते हुए दिया, जिसके जरिये महामारी के कारण कुछ अपराधियों को पैरोल व फर्लो देने के लिए महाराष्ट्र कारागार (बाम्बे फर्लो व पैरोल) नियमावली, 1959 के नियम-19 में संशोधन किया गया था।
1959 की नियमावली के हिसाब से नियम-19 के प्रावधान उन अपराधियों को पैरोल या फर्लो पर रिहा करने से रोकते हैं, जिन्हें गंभीर आर्थिक अपराधों या बैंक घोटालों या आईपीसी से इतर लागू मकोका, एनडीपीएस, यूएपीए, पीएमएलए जैसे विशेष कानूनों के तहत आने वाले अपराध में दोषी घोषित हो चुके हों।