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High Court: नवी मुंबई के इस वार्ड में चुनाव पर लगी रोक, भाजपा उम्मीदवार का नामांकन रद्द करने का आदेश स्थगित

Thu, 08 Jan 2026 08:34 PM IST
अमन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

बॉम्बे हाई कोर्ट ने नवी मुंबई के वार्ड 17A में होने वाले चुनाव पर रोक लगा दी है। मामले में रिटर्निंग ऑफिसर ने अवैध निर्माण का हवाला देकर बीजेपी उम्मीदवार नीलेश भोजाने का नामांकन रद्द कर दिया था। अब कोर्ट ने अधिकारी के फैसले को मनमाना बताया और कहा कि संबंधित नियम उम्मीदवार पर लागू नहीं होता। मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी।
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बॉम्बे हाई कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को नवी मुंबई नगर निगम के वार्ड 17A (वाशी) में होने वाले चुनाव पर अंतरिम रोक लगा दी। इसके साथ ही अदालत ने रिटर्निंग ऑफिसर के उस आदेश को भी स्थगित कर दिया, जिसमें बीजेपी उम्मीदवार का नामांकन रद्द किया गया था। मामले में रिटर्निंग ऑफिसर ने महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम की धारा 10(1डी) का हवाला देते हुए बीजेपी नेता नीलेश भोजाने का नामांकन खारिज कर दिया था। इसका आधार उनकी संपत्ति पर अवैध निर्माण बताया गया था।
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अदालत ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम अंखड की पीठ ने कहा कि चुनाव अधिकारी ने भोजाने का नामांकन खारिज करके 'पहली नजर में गैर-कानूनी और मनमाने तरीके से अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है'। अपने अंतरिम आदेश में, अदालत ने 15 जनवरी को होने वाले चुनाव के लिए भोजाने का नामांकन खारिज करने के फैसले पर रोक लगा दी। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य चुनाव आयोग, कमिश्नर और चुनाव अधिकारी वार्ड नंबर 17A की पार्षद सीट के चुनाव को लेकर फिलहाल कोई आगे की कार्रवाई नहीं करेंगे। मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी।

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क्या था मामला?
भोजाने ने रिटर्निंग ऑफिसर के 31 दिसंबर, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उनके नॉमिनेशन को अमान्य ठहराया गया था। महाराष्ट्र नगर निगम अधिनियम की धारा 10(1डी) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति पार्षद बनने के लिए अयोग्य होगा यदि उसने या उसके परिवार के किसी आश्रित सदस्य ने कोई अवैध या अनाधिकृत निर्माण किया है। अपनी याचिका में भोजाने ने तर्क दिया कि यह धारा केवल मौजूदा पार्षद पर लागू होती है, उम्मीदवारों पर नहीं। 
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पीठ ने अपने आदेश में कहा कि चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालना अलग बात है, लेकिन अधिकारियों का शक्तियों का गलत इस्तेमाल करना गंभीर विषय है। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को राहत देना जरूरी था क्योंकि प्रथम दृष्टया में यह धारा उनके मामले में लागू नहीं होती।

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