बॉम्बे हाईकोर्ट ने बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार से स्पष्ट करने को कहा कि क्या किसी मामले में अत्यधिक मीडिया रिपोर्टिंग करने से न्याय बाधित होता है। क्या यह अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत प्रशासन में हस्तक्षेप होगा।
क्या अदालत को मीडिया की रिपोर्टिंग पर दिशा निर्देश निर्धारित करना चाहिए। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी की पीठ ने इस मामले में सरकार से छह नवंबर तक जवाब देने के लिए कहा है।
हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि यदि किसी मामले की अत्यधिक रिपोर्टिंग हो रही है तो यह आरोपी को सतर्क कर सकता है और साक्ष्यों को नष्ट कर सकता है या वह फरार हो सकता है। अगर व्यक्ति बेकसूर है तो मीडिया की जरूरत से ज्यादा रिपोर्टिंग उसकी छवि खराब कर सकती है।
कोर्ट ने कहा कि हम नहीं चाहेंगे कि मीडिया अपनी लक्ष्मण रेखा लांघे। लेकिन क्या मीडिया की अत्यधिक रिपोर्टिंग अदालत की अवमानना अधिनियम की धारा 2 (सी) के तहत न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप है और क्या हमें दिशानिर्देश निर्धारित करना चाहिए।
पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल अनिल सिंह से उन परिदृश्यों पर भी विचार करने को कहा, जहां किसी मामले में चल रही जांच पर इस तरह की रिपोर्टिंग ने जांच अधिकारी को प्रभावित किया हो या इसके चलते गवाहों को धमकी मिली हो। हाईकोर्ट ने कहा कि क्या अदालत को ही प्रेस का नियमन बनाने को लेकर दिशानिर्देश तैयार करना होगा।