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Bombay HC: बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला, एकल मां का बच्चा पिता का सरनेम और जाति अपनाने के लिए मजबूर नहीं

Wed, 18 Feb 2026 11:51 PM IST
लव गौर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

Bombay HC: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि एकल मां का पाला हुआ बच्चा पिता का नाम, उपनाम और जाति अपनाने के लिए मजबूर नहीं है।
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बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मां ने अकेले जिस बच्चे को पाला हो उसे केवल इसलिए पिता का नाम, उपनाम और जाति धारण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता क्योंकि कभी ऐसा करना अनिवार्य था। हाईकोर्ट ने एक लड़की को स्कूल रिकॉर्ड में अपना नाम और जाति बदलने की अनुमति देते हुए यह बात कही।
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एकल मां को पूर्ण अभिभावक के रूप में मान्यता देना कोई दान नहीं
हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ की जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस हितेन वेनेगावकर ने अपने 2 फरवरी के फैसले में, जिसे बुधवार को अपलोड किया गया, कहा कि बच्चे की नागरिक पहचान के लिए एकल मां को पूर्ण अभिभावक के रूप में मान्यता देना कोई दान नहीं बल्कि सांविधानिक निष्ठा है। यह पितृसत्तात्मक बाध्यता से सांविधानिक विकल्प की ओर, वंश को भाग्य मानने के बदले गरिमा को अधिकार मानने की ओर बदलाव को दर्शाता है।

अदालत ने की यह टिप्पणी
अदालत ने कहा कि एक ऐसा समाज जो खुद को विकासशील कहता है, वह इस बात पर जोर नहीं दे सकता कि बच्चे की सार्वजनिक पहचान उस पिता से जुड़ी हो जो उसके जीवन में अनुपस्थित है, जबकि मां, जो पालन-पोषण का पूरा भार वहन करती है, प्रशासनिक रूप से गौण बनी रहे। मां द्वारा पाले-पोसे गए बच्चे को, राज्य द्वारा निर्धारित परिभाषा के रूप में, पिता का नाम और उपनाम धारण करने के लिए सिर्फ इसलिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि कभी ऐसा किया जाता था।
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12 वर्ष की बच्ची की याचिका पर दिया निर्देश
हाईकोर्ट ने यह आदेश 12 वर्ष की एक बच्ची की याचिका पर दिया, जिसमें उसने स्कूल रिकॉर्ड में अपना नाम और जाति प्रविष्टि मराठा से बदलकर अनुसूचित जाति-महार करने की मांग की थी। याचिका के अनुसार, बच्ची की मां एकल अभिभावक और उसकी प्राकृतिक संरक्षक है। बच्ची के पिता पर मां ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। लेकिन बाद में दोनों पक्षों में समझौता हो गया और यह तय हुआ कि बच्ची मां की स्थायी देखरेख में रहेगी। बच्ची ने पिछले साल स्कूल अधिकारियों की ओर से अपना नाम और जाति बदलने के अनुरोध को अस्वीकार करने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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