केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जल्द ही बोफोर्स मामले में निजी जासूस माइकल हर्शमैन से जानकारी हासिल करने के लिए अमेरिका को एक औपचारिक अनुरोध भेजेगा। हर्शमैन ने 1980 के दशक में हुए 64 करोड़ रुपये के कथित बोफोर्स रिश्वत घोटाले के बारे में अहम जानकारी भारतीय एजेंसियों के साथ साझा करने की इच्छा जाहिर की थी। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी।
सीबीआई ने एक विशेष अदालत को इस घटनाक्रम की जानकारी दी है, मामले की जांच के लिए एजेंसी की याचिका पर सुनवाई कर रही है। अधिकारियों के मुताबिक, इस साल अक्तूबर में लेटर रोगेटरी (एलआर) की प्रक्रिया शुरू हुई और अमेरिका को औपचारिक अनुरोध भेजने में तीन महीने लग सकते हैं। एलआर का मकस कथित रिश्वत कांड की आगे की जांच के लिए सूचना हासिल करना है।
क्या है लेटर रोगेटरी
लेटर रोगेटरी एक लिखित अनुरोध है, जो एक देश की अदालत किसी आपराधिक मामले की जांच या मुकदमे में मदद हासिल करने के लिए दूसरे देश की अदालत को भेजती है।
हाईकोर्ट ने राजीव गांधी को किया था बरी
दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को इस मामले में बरी कर दिया था। उसके एक साल बाद इस मामले में हिंदुजा बंधुओं सहित बाकी आरोपियों के खिलाफ बी सभी आरोपों को खारिज कर दिया गया था। इटली के कारोबारी एवं कथित रिश्वत मामले में बिचौलिये ओत्तावियो क्वात्रोची को 2011 में एक अदालत ने बरी कर दिया था। अदालत ने सीबीआई को उनके खिलाफ मुकदमा वापस लेने की अनुमति दी थी
क्या है पूरा मामला
1980 के दशक में कांग्रेस की सरकार देश में सत्ता में थी। तब स्वीडन की कंपनी बोफोर्स के साथ 1,437 करोड़ रुपये के सौदे में 64 करोड़ रुपये की रिश्वत के आरोप लगे थे। यह सौदा 400 हॉवित्जर तोपों की आपूर्ति के लिए किया गया था, जिसने कारगिल युद्ध के दौरान भारत की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह मामला 2011 में बंद कर दिया गया था।
हर्शमैन ने लगाया था आरोप
हर्शमैन साल 2017 में एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए थे। इस दौरान वह कई मंचों पर दिखाई दिए। इस दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने घोटाले की जांच को पटरी से उतार दिया था। हर्शमैन ने कहा था कि वह सीबीआई के साथ जानकारी साझा करने के लिए तैयार हैं। सीबीआई ने विशेष अदालत को बताया कि हर्शमैन के खुलासे के बाद वह फिर से जांच को खोलने की योजना बना रही है।