जिस तरह 2008 में कर्नाटक में सरकार बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण में अपना प्रवेश द्वार खोला था, उसी तरह 2016 में असम में अपने गठबंधन के साथ पूर्ण बहुमत से जीत हासिल करके भाजपा ने पूर्वोत्तर में अपने प्रसार के लिए रास्ता खोल लिया है।
असम की ऐतिहासिक जीत भाजपा को न सिर्फ पूर्वोत्तर में आगे बढ़ाने वाली है बल्कि दिल्ली और बिहार की हार के बाद भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ घटने और मोदी लहर के कमजोर होने की धारणा को भी तोड़ने वाली है। असम विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए मोदी सरकार के दो साल पूरे होने के मौके पर किसी बड़े सियासी तोहफे से कम नहीं हैं। वहीं कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा सबक हैं। बशर्ते कांग्रेस नेतृत्व कोई सबक सीखना चाहे।
असम की कुल 126 विधानसभा सीटों पर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने न सिर्फ बहुमत के लिए जरूरी 64 का आंकड़ा पार किया, बल्कि मिशन 84 के नारे को भी हकीकत में बदल दिया। राज्य में भाजपा की जीत का सबसे बड़ा कारण राज्य की जनता की पिछले 15 साल से राज कर रही कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को बदलने की तीव्र इच्छा है।
हालांकि गोगोई के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई गंभीर आरोप या नाराजगी नहीं थी, लेकिन फिर भी राज्य के बहुसंख्यक लोग लंबे कांग्रेसी शासन के बाद भाजपा को एक मौका देना चाहते थे। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह अपील अच्छी लगी कि असम के विकास के लिए राज्य और केंद्र में एक दल की सरकार होना जरूरी है।
यह भी सच है कि भले ही गोगोई की छवि साफ सुथरी हो लेकिन उनकी सरकार और प्रशासन की चाल ढाल से लोग संतुष्ट नहीं थे। इसके अलावा भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को जबर्दस्त तरीके से उठाया।
जबकि कांग्रेस निचले असम में 50 फीसदी से भी ज्यादा बांग्लादेशी मुसलमानों के वोट बैंक के मुद्दे पर कठघरे में खड़ी नजर आई। भाजपा ने बांग्लादेश से भारत आने वाले मुसलमानों की घुसपैठ रोकने और हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा करके राज्य में हिंदु ध्रुवीकरण का भी कार्ड खेलने में कामयाबी हासिल की।
असम चुनावों में भाजपा ने वह गलती नहीं की जो उसने बिहार में की थी। चुनाव से पहले ही केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाकर उन्हें मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश कर दिया गया।
साथ ही पूरे प्रचार अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ सोनोवाल और कांग्रेस से दलबदल कर आए पूर्व मंत्री हेमंतो विश्वसर्मा को हर पोस्टर बैनर और होर्डिंग में बराबर जगह दी गई।
चुनाव से कई महीने पहले भाजपा ने कांग्रेस में सेंध लगाकर असंतुष्ट नेता हेमंतो विश्वसर्मा और उनके साथी विधायकों को पार्टी में शामिल करके आधी जंग जीत ली थी। असम में माना जाता है कि गोगोई और कांग्रेस के राजनीतिक प्रबंधन की ताकत विश्वसर्मा का रणनीतिक कौशल ही था।
लेकिन तरुण गोगोई के साथ सत्ता संघर्ष ने विश्वसर्मा को पार्टी छोड़ने और भाजपा का दामन थामने को मजबूर कर दिया। भाजपा ने विश्वसर्मा को चुनाव प्रचार अभियान का प्रमुख बनाकर कांग्रेस के सारे ताने बाने अव्यवस्थित कर दिया।
साथ ही भाजपा ने चुनाव पूर्व गठबंधन करने में कांग्रेस को पछाड़ दिया। कांग्रेस ने सिर्फ एक स्थानीय बोडो संगठन के साथ छोटा सा गठबंधन किया और ज्यादातर सीटों पर खुद चुनाव लड़ी। वहीं भाजपा ने असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट के साथ मजबूत गठबंधन बनाया। इसका फायदा भाजपा को ऊपरी, मध्य और निचले तीनों इलाकों में मिला।
इन दोनों दलों ने कांग्रेस से गठबंधन की भी कोशिश की लेकिन उन्हें तरजीह नहीं मिली। इसी तरह इत्र व्यापारी और बांग्लादेशी मुसलमानों के नेता बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईडीयूएफ ने भी कांग्रेस के साथ गठबंधन की खासी कोशिश की। खुद नीतीश कुमार ने इस बारे में कांग्रेस नेताओं से बात की।
लेकिन गोगोई तैयार नहीं हुए। उनका तर्क था कि इससे राज्य में भाजपा हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण कराने में कामयाब रहेगी। एआईयूडीफ के अलग चुनाव लड़ने से करीब 35 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले असम में मुस्लिम मतों का बंटवारा हो गया। इसका फायदा भी भाजपा गठबंधन को मिला। जबकि कांग्रेस को उम्मीद थी कि मुसलमानों का एकमुश्त समर्थन उसे मिलेगा।
कांग्रेस ने अपना पूरा चुनाव अभियान मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के कंधों पर ही छोड़ दिया था। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य केंद्रीय नेता चुनाव प्रचार के लिए गए जरूर लेकिन राज्य में हर जगह गोगोई की ही तस्वीर थी। कांग्रेस की राह का कांटा बने बदरुद्दीन अजमल को भी घाटा उठाना पड़ा। एआईडीयूएफ की सीटें भी घट गईं।