त्रिपुरा की चुनावी जंग में भाजपा माणिक सरकार के खिलाफ सूबे में बने माहौल और पीएम मोदी की लोकप्रियता को सियासी औजार बनाएगी। पार्टी को उम्मीद है कि त्रिपुरा में इस दफे भाजपा की अपने दम पर सरकार बनेगी। पार्टी के अंदरूनी सर्वे में उसे बहुमत से ज्यादा सीटें मिलती दिख रही हैं। त्रिपुरा ऐसा राज्य है जहां भाजपा का सीधा मुकाबला वाम दल के साथ है। वर्ष 1993 से सूबे का मुख्यमंत्री रहते हुए माणिक सरकार के प्रति जनता में रोष है। उस रोष को भाजपा अपने पक्ष में भुनाना चाहती है। इसके साथ ही भाजपा ने सूबे की जनता में पीएम मोदी के नेतृत्व और विकास के एजेंडे को प्रचारित करने का निर्णय लिया है। सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई है कि राज्य की जनता भी विकास को लेकर उत्सुक है।
त्रिपुरा की जीत से कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएगी भाजपा
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि गुजरात चुनाव के बाद कार्यकर्ताओं के मन में जो निराशा पैदा हुई है। त्रिपुरा की जीत कार्यकर्ताओं के मन से निराशा हटाकर उसका मनोबल बढ़ाएगी। क्योंकि त्रिपुरा में भाजपा का सीधा मुकाबला अपने धूर वैचारिक विरोधी वाम दल से है। वाम दल को सीधे पटकनी देने से इसका राष्ट्रीय स्तर पर संदेश जाएगा।
पीछे के बिहार और दिल्ली के हार का उल्लेख करते हुए उक्त नेता ने कहा कि इन दो राज्यों में भाजपा की हार के बाद कार्यकर्ताओं के मन में निराशा पैदा हुई थी। लेकिन असम की जीत ने उनमें दोबारा से जोश भरा। उसके बाद पार्टी का विजयी अभियान दोबारा शुरू हो सका। ठीक उसी तरह गुजरात में भाजपा की बेशक जीत हुई है। मगर 115 से घटकर 99 सीटें आने से कार्यकर्ताओं में मन में निराशा है। उन्हें इस बात का अहसास हो रहा है कि गुजरात का मुकाबला नजदीकी था। वहां हार भी मिल सकती थी। लेकिन त्रिपुरा की जीत से कार्यकर्ताओं के मन में जोश पैदा होगा।
पूर्वोत्तर में अरूणाचल और नागालैंड में अपनी सरकार बनाकर भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि चुनाव जीते बिना सरकार बनाने के खेल में उसे महारत हासिल हो गई है। पहले कांग्रेस पार्टी इस खेल की खिलाड़ी मानी जाती थी। मगर इस मामले में भाजपा उससे आगे निकल गई है। मगर पार्टी ने त्रिपुरा के चुनाव में सीधी जीत की रणनीति बनाई है। इसलिए बीते 6 माह से पार्टी अपने प्लान को जमीन पर उतारने में लगी हुई थी। चुनाव के ऐलान से पहले ही भाजपा ने त्रिपुरा की जनता के बीच यह विश्ववास पैदा कर दिया है कि माणिक सरकार का विकल्प वही है।
विकल्प बनने के कवायद में भाजपा ने तृणमूल के जहां सभी विधायकों को भाजपा में शामिल कर लिया। तो कांग्रेस के भी बड़े नेता और विधायक भाजपा के फोल्ड में आ गए। इसके अलावा पार्टी ने सूबे की राजनीति गणित में अहम भूमिका निभाने वाली आदिवासी इलाकों में भी अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। आदिवासियों के बीच के दो प्रमुख दलों आईपीएफटी और आईएनपीटी पर डोरे डाल दिए हैं। आईपीएफटी के साथ उसका गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है। तो आईएनपीटी भाजपा और वाम दोनों के ही संपर्क में है।
मतलब वोट के गणित के मामले में भी भाजपा ने कांग्रेस और तृणमूल के लोगों को अपने पाले में कर जमीन मजबूत कर ली है। तो आदिवासी इलाकों में भी वह आदिवासी दलों के साथ हाथ मिलाकर वाम के खिलाफ पूरी मोर्चेबंदी की तैयारी में है। पार्टी के एक नेता की माने तो उनकी रणनीति का असर होने लगा है। खुद वाम दलों की ओर से त्रिपुरा चुनाव को महाभारत का युद्ध करार दिया जाने लगा है। इसका संकेत है कि वाम दल अपनी सियासी जमीन खो रहे हैं। वैसे भी पार्टी ने पूर्वोत्तर की राजनीति और जोड़तोड़ के माहिर खिलाड़ी हेमंत विश्व शर्मा को सूबे की कमान सौंप रखी है। राष्ट्रीय महासचिव राम माधव के निर्देशों पर शर्मा चुनावी रणनीति को जमीन पर उतार रहे हैं।