रविशंकर प्रसाद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री रराजनाथ सिंह, केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, अनंत कुमार और खुद उन्होंने आपातकाल के दौरान काफी संघर्ष किया और यातनाएं झेली।
उन्होंने उन दिनों की यादों को साझा करते हुए कहा कि उस समय भी कांग्रेस ने केवल इंदिरा गांधी को बचाने के लिए आपातकाल लगाया था। उन्होंने आपातकाल पर लिखी एक किताब का हवाला देते हुए कहा कि आपातकाल लगाने की तैयारी छह माह पहले ही कर ली गई थीं, और इस बारे में सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा गांधी को एक पत्र भी लिखा था, जिसमें ऑर्डिनेंस आते ही गिरफ्तार होने वालों की लिस्ट तैयार रखने की बात कही गई थी।
उन्होंने कहा कि संविधान के मुताबिक आपातकाल लगाने का फैसला कैबिनेट करती है लेकिन 12 बजे तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने कागजों पर दस्तखत कर दिए, जबकि कैबिनेट की बैठक अगले दिन 26 जून सुबह छह बजे हुई।
उन्होंने कहा कि जनवरी 1975 से 12 जून 1975 तक इमरजेंसी लगाने की तैयारी की गयी। उन्होंने बताया कि एक लाख 10 हजार 806 लोगों को मीसा कानून (मेटिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी) में बंद किया गया और 75 हजार 818 लोग डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट (डीआईआर) में बंद हुए।
उन्होंने बताया कि उस समय कोई न तो कोई अपील थी, न कोई वकील और न ही कोई दलील। उस समय अगर जेल में किसी को गोली भी मार दी जाए, तो कोई अदालत में भी कोई सुनवाई नहीं थी।
उन्होंने कहा कि उस दौरान संसद को पंगु कर दिया गया था। प्रजातंत्र के हर पहलू पर हमला हुआ था। उन्होंने कहा कि यह इंसान पर, प्रेस पर और न्यायपालिका पर हमला था।
रविशंकर प्रसाद, राहुल गांधी
प्रसाद ने कहा कि आपातकाल के दौरान भारत के सभी हाई कोर्ट ने साहस दिखाया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने निराश किया था। उन्होंने बताया कि एमएच बेग को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। उन्होंने अपने एक जजमेंट में लिखा कि जेल में लोगों को ग्रेंड मदर ट्रीटमेंट दिया जा रहा है।
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आज भी कांग्रेस न्यायपालिका के साथ ठीक से व्यवहार नहीं करती है और न्यायपालिका के साथ जो कांग्रेस ने व्यवहार किया वह धमकाने की कोशिश जैसा व्यवहार था। कांग्रेस ने न्यायपालिका की गरिमा गिराई है और जानबूझकर न्यायपालिका को एक संदेश देने की कोशिश करते हैं।
उन्होंने कहा कि आपातकाल में संविधान संशोधनों के जरिए इंदिरा गांधी को बचाने के प्रावधान लाए गए थे। जिसमें संसद के सत्र को 5 साल से बढ़ा कर 6 साल किया गया। प्रधानमंत्री के चुनाव को चुनौती न देने का प्रावधान लाया गया। संसद से कानून बनाने का अधिकार छीन लिया गया। इसके अलावा हाईकोर्ट से पीआईएल सुनने का अधिकार भी छीन लिया गया।
प्रसाद ने बताया कि कांग्रेस में परिवार के प्रति निष्ठा चरम पर पहुंच गई थी कि स्वर्ण सिंह, जगजीवन राम आदि बड़े नेता भी मुंह खोलने में घबराते थे। उन्होंने कहा कि आपातकाल के दौर में देश में चापलूसी की संस्कृति पैदा की गई और उसकी अगुवाई तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने की थी। बहुत से लोगों ने आपातकाल को ‘अनुशासन पर्व’ भी कहा था।
बिहार की एक घटना का जिक्र करते हुए प्रसाद ने कहा कि उस वक्त बिहार में कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने एक नारा दिया था, 'इंदिरा तेरे नाम की जय, तेरे काम की जय, तेरे सबह की जय, तेरे शाम की जय।' हमने इस नारे की घुम-घूमकर पूरे बिहार में पिटाई की थी।
प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस चुनाव हारती है, तो कहती है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और चुनाव आयोग खराब हैं। जीतें तो सब ठीक है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने खुद से कह दिया कि वह प्रधानमंत्री बनेंगे, लेकिन कांग्रेस के किसी नेता ने उनका समर्थन नहीं किया। कांग्रेस सेना प्रमुख पर हमला करती है और चुनाव आयोग एवं मुख्य चुनाव आयुक्त तक को निशाना बनाते हैं।
वहीं रविशंकर ने उस प्रस्ताव का स्वागत किया जिसमें आपातकाल के घटनाक्रम को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की बात कही गई थी ताकि नई पीढ़ी को भी लोकतंत्र के सामने संभावित खतरों की जानकारी रहे।