बीते चुनाव के मुकाबले इस बार भाजपा के सामने चुनौती बड़ी है। बीते चुनाव में विपक्ष में बिखराव के कारण वर्ष 1999 के मुकाबले महज दो फीसदी ज्यादा वोट हासिल करने पर ही पार्टी को सौ सीटों का लाभ हुआ था। इस बार भाजपा के खिलाफ राज्यों में क्षेत्रीय दलों को आपस में और कांग्रेस के साथ मजबूत गठबंधन की जमीन तैयार हो रही है।
मसलन यूपी में सपा-बसपा एक हुए हैं तो कर्नाटक में जदएस और कांग्रेस के बीच समझौता हुआ है। कांग्रेस असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी तो बसपा के साथ मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में गठबंधन की जमीन तैयार कर रही है। बीते चुनाव के मुकाबले देखा जाय तो इस विपक्षी गठबंधन का वोट प्रतिशत भाजपा के मुकाबले बहुत ज्यादा है।
प्रभाव वाले राज्य भी हैं चुनौती
अगले लोकसभा में पार्टी को अपने प्रभाव वाले उन राज्यों में बड़ी चुनौती झेलनी होगी, जहां वह लंबे समय से सत्ता में है। बीते लोकसभा चुनाव में पार्टी को हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, गोवा, हिमाचल प्रदेश की 213 में से 196 सीटें मिली थी। जिन छह राज्यों जम्मू-कश्मीर, असम, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पंजाब की 149 सीटों में से पार्टी ने 74 सीटें जीती थीं, वहां नए-नए राजनीतिक समीकरण उभर कर सामने आए हैं। वैसे भी बीते लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी शसित जिन दो राज्यों गुजरात और गोवा में विधानसभा चुनाव हुए वहां पार्टी पुराना प्रदर्शन दुहराने से बहुत दूर रही। ऐसे में पार्टी के सामने अपनी पुरानी सीटों को बचाने की बड़ी चुनौती है।
पिछला लोकसभा चुनाव जीतने के साथ ही पार्टी ने विस्तार की संभावना के लिए समुद्र तटीय राज्यों का चयन किया था। इनमें तमिलनाडु में डीएमके की कमान स्टालिन के हाथों जाने और अलागिरी के उनके साथ खड़े होने से पार्टी की रणनीति गड़बड़ा गई। दूसरी ओर आंध्रप्रदेश में टीडीपी ने पार्टी से किनारा कर लिया। ओडिशा और पश्चिम बंगाल में पार्टी नंबर दो की रेस में तो है, मगर उपचुनावों का प्रदर्शन बताता है कि इन राज्यों में सत्तारूढ़ टीएमसी और बीजेडी की जगह कांग्रेस और वाम दल कमजोर हो रहे हैं।