पश्चिम बंगाल में मई के पहले सप्ताह में होने वाले पंचायत चुनाव यहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का विकल्प बनने का दावा करने वाली भाजपा के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे। हालांकि पार्टी ने स्कूल की बोर्ड परीक्षाओं के दौरान इसकी अधिसूचना जारी करने का विरोध किया है और इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने की भी धमकी दी है। लेकिन बावजूद इसके पार्टी इन चुनावों में खासकर ग्रामीण इलाकों में अपनी पैठ जमाने का प्रयास करेगी।
बंगाल के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव राज्य में विधानसभा चुनाव के नतीजों का संकेत देते रहे हैं। जो पार्टी इन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करती है उसे विधानसभा चुनावों में भी खासी कामयाबी मिलती रही है। वर्ष 2008 के पंचायत चुनावों में मिली भारी कामयाबी ने ही ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस के वर्ष 2011 में सत्ता में आने की राह प्रशस्त की थी। उससे पहले पंचायतों पर मजबूत पकड़ की वजह से ही वाममोर्चा तीन दशक से भी लंबे समय तक राज्य की सत्ता पर काबिज रहा था।
बीते लोकसभा चुनावों के बाद राज्य में होने वाले तमाम उपचुनावों में कांग्रेस व वाममोर्चा को पीछे धकेल कर भाजपा दूसरे स्थान पर रही है। लेकिन पहले स्थान पर रही तृणमूल कांग्रेस के साथ नंबर दो का फासला बहुत ज्यादा है। भाजपा अबकी पंचायत चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के जरिए अपने फासले को कम करने का प्रयास करेगी। पंचायत चुनावों को ध्यान में रखते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस महीने दो बार बंगाल के दौरे पर आकर दो-दो दिन राज्य में गुजारेंगे।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने फिलहाल स्कूली परीक्षाओं के दौरान चुनाव अधिसूचना जारी करने का विरोध करते हुए इसके खिलाफ अदालत में जाने की दमकी दी है। उन्होंने कहा कि 12 अप्रैल तक परीक्षाएं जारी रहने की वजह से लाउडस्पीकरों के जरिए प्रचार नहीं किया जा सकता।
घोष की दलील है कि वर्ष 1999 में स्कूली परीक्षाओं के दौरान चुनावों के एलान के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस ने कलकत्ता हाईकोर्ट की शरण ली थी। कोर्ट ने तब परीक्षा के दौरान चुनाव नहीं कराने का निर्देश दिया था। लेकिन अब सत्ता में आने के बाद तृणमूल उल्टा काम कर रही है।