जातिगत राजनीति गरमाई
गरीब सवर्ण को आरक्षण देने का बिल पेश होने के बाद संसद में राजनीतिक दलों ने जातिगत राजनीति को फिर हवा देना शुरू कर दिया है। राजद के प्रो. मनोज झा ने एससी, एसटी, ओबीसी के लिए दिए जा रहे आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 85 प्रतिशत करने की मांग की। समाजवादी पार्टी के प्रो. रामगोपाल यादव ने अन्य पिछड़ी जाति के लोगों के लिए इसे 27 फीसदी से बढ़ाकर 54 प्रतिशत करने की मांग की। राजद के जय प्रकाश यादव का कहना है कि सरकार जातिगत आधार पर जनगणना कराए और जिसकी जितनी आबादी हो, उसे उस हिसाब से आरक्षण दिए जाएं।
विपक्षी दलों के पास बस एक बहाना
एनसीपी की सुप्रिया सूले ने सवाल उठाया कि सरकार संसद का शीत कालीन सत्र समाप्त होने के अंतिम दिन इस बिल को लेकर क्यों आई? रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा, कांग्रेस के दीपेन्द्र हुड्डा, राजद के जयप्रकाश यादव, समाजवादी पार्टी के धर्मेंन्द्र यादव समेत तृणमूल और अन्य राजनीतिक दलों के सांसदों ने भी यही सवाल उठाया है। कांग्रेस पार्टी के बीके हरिप्रसाद, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद, राजद की मीसा भारती ने भी यही सवाल उठाया है। हालांकि इस बारे में केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री का शिवप्रताप शुक्ला ने कहा कि इस सवाल का कोई अर्थ नहीं है। सरकार यह बिल लाई है। वह गरीब सवर्णों को उनका अधिकार देकर सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ आगे बढ़ रही है। यह ऐतिहासिक और स्वागत योग्य कदम है।
भाजपा के चेहरे पर खुशी, विपक्ष के चेहरे पर मातम क्यों?
-पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़, म.प्र. में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का देश में जादू फीका पड़ जाने के तौर पर देखा जा रहा है। चुनाव नतीजे आने के बाद से कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के चेहरे खिल गए हैं। माना जा रहा है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने बिल लाकर सबकी बोलती बंद कर दी है। राफेल लड़ाकू विमान, किसान, रोजगार समेत अन्य मुख्य मुद्दे फिलवक्त दब गए हैं।
-2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भाजपा की सबसे बड़ी चिंता उ.प्र. को लेकर है। यहां से ब्राह्मण समेत अन्य मतदाताओं पार्टी की पकड़ कमजोर हो रही थी। म.प्र. समेत तमाम राज्यों में सवर्ण मतदाता भाजपा से नाराज बताए जा रहे थे। एक अनुमान के मुताबिक उ.प्र. करीब 28 प्रतिशत सवर्ण मतदाता हैं। इनमें करीब 15 प्रतिशत ब्राह्मण, चार-पांच प्रतिशत क्षत्रिय समेत अन्य हैं। माना जा रहा है कि यह बिल अगड़ी जातियों को भाजपा के साथ बने रहने में सहायक होगा।
-भाजपा को इसका फायदा उ.प्र., म.प्र. के अलावा गुजरात, झारखंड, राजस्थान, म.प्र., दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, असम, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल में मिल सकता है। इन राज्यों में 2014 के चुनाव में भाजपा ने 190 से अधिक सीटों को जीतने में सफलता पाई थी।