भाजपा के नेता ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की सेवानिवृति की उम्र बढ़ा कर 70 साल की दी जाए। पत्र में लिखा है कि अगर जजों की सेवानिवृति की उम्र नहीं बढ़ाई गई, तो मामलों को निबटाने में 320 साल लग सकते हैं।
भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट में वकील अश्विनी उपाध्याय ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा है कि इस साल 6 जज रिटायर हो रहे हैं। इसी साल गर्मियों की छुट्टियों के बाद जस्टिस आदर्श कुमार गोयल 6 जुलाई को सेवानिवृत्त होगें, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर को रिटायर होंगे। साथ ही कोलेजिएम के दो सदस्य जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस मदन लोकुर भी साल के आखिर तक 29 नवंबर और 30 दिसंबर को सेवानिवृत हो जाएंगे।
यह पत्र मुख्य रूप से भारत में बढ़ते लंबित मामलों को दर्शाता है, देश की अदालतों में इन दिनों 3 करोड़ ज्यादा मामले विचाराधीन हैं, जो सिर्फ लंबे खिंच रहे हैं और किसी तर्कसंगत फैसले तक नहीं पहुंच पाए हैं। अपने पत्र में उपाध्याय ने अपील की है कि सेवानिवृत्ति की मौजूदा उम्र 65 है, जिसके चलते बैंचों में उनका बेहतरीन अनुभव काम नहीं आ पाता और उन्हें सत्तर साल की अवस्था से पहले ही रिटायर होना पड़ता है।
अपने लिखे पत्र में उपाध्याय ने यह भी रेखांकित किया है कि अंतर्राष्ट्रीय मानदंड के मुताबिक विदेशों में जजों की सेवानिवृति उम्र भारत से ज्यादा है। उपाध्याय के मुताबिक ब्रिटेन में जज 75 साल की आयु में सेवानिवृत होते हैं और ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम और नॉर्वे में सेवानिवृत्ति उम्र 70 निर्धारित है। वहीं, अमेरिका, रूस, न्यूजीलैंड और आइसलैंड में शारीरिक और मानसिक फिटनेस के आधार पर वह पूरी उम्र काम करते हैं।
अश्विनी ने पीएम को लिखे अपने पत्र में लिखा है कि ज्यूडिशियरी सिस्टम को 31.28 करोड़ मामलों को निपटाने में 320 साल लग जाएंगे। जजों की कम संख्या के चलते मामलों संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। 10 लाख मामलों पर 13.05 जज हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया में प्रति लाख पर 58, कनाडा में 75 और ब्रिटेन में 100 हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 130 है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु में अंतिम बढ़ोतरी 1963 में हुई थी, जब इसे 60 साल से बढ़ा कर 62 वर्ष तक किया गया था। 2008 में तत्कालीन कानून मंत्री एचआर भारद्वाज ने भी जजों की उम्र बढ़ाने को लेकर प्रस्ताव जारी किया था।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2010 में उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के लिए कानून के लिए मंजूरी दे दी थी। हालांकि, राजनीतिक सर्वसम्मति की कमी के चलते, इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।