दरअसल, भाजपा ने हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में शानदार सफलता हासिल की है। उत्तर प्रदेश में इतिहास रचते हुए उसने तमाम विपरीत समीकरणों के बीच भी दोबारा सत्ता में आने का करिश्मा कर दिखाया है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि पार्टी को यह सफलता केवल इसलिए हासिल हुई है क्योंकि उसने उच्च जातियों के साथ-साथ ओबीसी और दलित जातियों के बीच अपनी पैठ मजबूत बनाने में सफल रही है। आगरा जैसे दलित बाहुल्य वाले क्षेत्र में भाजपा सभी विधानसभा सीटें जीतने में कामयाब रही है। यह केवल तभी संभव हो सकता था जबकि दलित समुदाय मायावती को छोड़कर उसके साथ खड़ा हो।
2014 से लेकर 2022 तक के चुनाव परिणाम और मत प्रतिशत भी इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि समाज के हर वर्ग में उसके समर्थक पैदा हुए हैं, जो अपने जाति-धर्म की परंपरागत सोच से ऊपर उठकर उसका समर्थन कर रहे हैं। भाजपा चाहती है कि इन वोटरों का समर्थन उसके लिए आगे भी जारी रहे, लिहाजा पार्टी संगठन और सरकार में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देकर उनकी भावनाओं को संतुष्ट करने की कोशिश की जा रही है। इस अभियान में भाजपा की इसी कोशिश को ओबीसी-दलित मतदाताओं तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी।
अखिलेश-तेजस्वी ने डराया
राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने अमर उजाला से कहा कि यह सही है कि तमाम चुनावी तिकड़मों का इस्तेमाल करते हुए भाजपा ने बिहार और अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर ली है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के सामाजिक न्याय के नारे ने भाजपा को असहज कर दिया था। दोनों ही राज्यों में उसे अपने हार की आशंका सता रही थी। भाजपा के कमंडल की राजनीति को यदि कहीं से टक्कर मिलती दिख रही है तो इसी मंडलवाद की राजनीति से मिलती दिख रही है।
जातिवाद का लंबा असर
भाजपा को यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि जातीय सोच इस देश में धार्मिक उन्माद से ज्यादा स्थाई है। मुद्दे गुजरने के बाद लोग अपनी-अपनी जातीय सोच पर आ जाते हैं और उसी सामाजिक सोच के अनुसार व्यवहार करने लगते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण राम मंदिर आंदोलन के रूप में देखा जा सकता है। मंदिर आंदोलन में भारी जनसमर्थन पाने के बाद जैसे ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण शुरू हुआ, लोगों की दृष्टि में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया। वर्तमान दौर में जो धार्मिक कट्टरता दिखाई पड़ रही है, बदलते समय में यह खत्म हो सकती है। उस परिस्थिति में भाजपा को दूसरे दलों से टक्कर लेने के लिए सामाजिक न्याय जैसी बेहतर सोच की आवश्यकता पड़ेगी। पार्टी उसी दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है।
ओबीसी को साधने का लाभ
भाजपा की राजनीतिक यात्रा इस बात की गवाह रही है कि जब तक उसने उच्च जातियों और बनियों की राजनीति की, वह एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाई। लेकिन जैसे ही उसने ओबीसी जातियों में अपनी पैठ बनाई, उमा भारती, कल्याण सिंह, शिवराज सिंह चौहान जैसे नेताओं को आगे बढ़ाकर ओबीसी जातियों को अपने साथ जोड़ा, उसकी सियासत चमकती चली गई। ओबीसी-दलित जातियों के एक छोटे हिस्से के समर्थन से ही भाजपा ने 2014 और 2019 में करिश्माई सफलता हासिल की है। यदि इस आधार वोट बैंक को और अधिक मजबूत बनाया जा सके, तो उसकी राजनीति को ज्यादा स्थायित्व मिल सकता है। लिहाजा पार्टी बहुत सोच-समझकर अपना अभियान आगे बढ़ा रही है।
हिंदू राष्ट्रवाद की मशाल ओबीसी-दलितों के हाथ देने की तैयारी
विपक्षी दल सदैव इस बात का आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा का मातृ संगठन आरएसएस देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। यदि ये आरोप सही हैं तो आरएसएस का एजेंडा तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक कि ओबीसी और दलित समुदाय का एक बड़ा तबका उसके साथ नहीं जुड़ जाता है। माना जा सकता है कि अपने इसी एजेंडे के तहत आरएसएस अपने ‘हिंदुत्व’ के खांचे में धीरे-धीरे हिंदू समाज के सभी वर्गों को साथ लाने की कोशिश करता रहा है।
ओबीसी जातियों में गहरी पैठ बनाने के बाद अब उसका अगला निशाना दलित जातियों पर है। वह उन्हें साथ लेकर अपने हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर आगे बढ़ सकती है। यानी हिंदुत्व की मशाल अब दलित जातियों के हाथ में थमाने की कोशिश हो सकती है। इस रणनीति पर आगे बढ़ने के लिए भाजपा के 42वें स्थापना दिवस को चुना गया है। पार्टी के सामाजिक न्याय अभियान के गहरे निहितार्थ हो सकते हैं जिसे समझने की आवश्यकता है।