बैठक में तीन राज्यों में पार्टी की हार के बाद तेवर दिखा रहे अपना दल और सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी को जोड़े रखने के अलावा छोटे-छोटे जातिगत समूहों को चिह्नित कर इन्हें पार्टी से जोड़ने की रणनीति बनी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सपा-बसपा गठबंधन के बाद पार्टी एनडीए का कुनबा बिखरने का संदेश नहीं देना चाहती। एनडीए से किसी दल के अलग होने पर राज्य के मतदाताओं में सपा-बसपा गठबंधन के मजबूत होने के साथ ही इसके भय से एनडीए के बिखरने का भी सियासी संदेश जाएगा। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह इसी महीने राज्य का दौराकर गठबंधन सहयोगियों से जुड़े मामलों को देखेंगे।
सभी 80 सीटों की ली रिपोर्ट
बैठक में शाह ने विस्तारकों, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन मंत्री से सूबे की सभी 80 सीटों की सीटवार रिपोर्टिंग ली। इस दौरान दर्जन भर चुनिंदा सीटों पर व्यापक विचार विमर्श भी हुआ। इसके अलावा सभी सीटों पर बूथ प्रबंधन की स्थिति भी आंकी गई। माना जा रहा है कि सांसदों को टिकट मिलेगा या नहीं, यह इसी रिपोर्ट के आधार पर तय होगा।
इस कारण है चिंता
दरअसल ढाई दशक पूर्व सपा-बसपा गठबंधन ने ही भाजपा को राज्य की सत्ता से बाहर किया था। विधानसभा चुनाव के बाद तीन लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में यह गठबंधन भाजपा पर भारी पड़ा था। विधानसभा चुनाव के नतीजों के मुताबिक अगर सपा-बसपा के हासिल मतों को मिला दिया जाए तो यह भाजपा को मिले 42 फीसदी वोटों के बराबर है। फिर इनके समर्थक मतदाता माने जाने वाले मुसलमान, दलित और यादवों की आबादी 20 सीटों पर 50 फीसदी से ज्यादा है।