आसाम चुनाव में भाजपा ने क्षेत्रीय दलों से किया गठबंधन
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असम समेत पूर्वोत्तर की जीवनदायी एकमात्र नदी ब्रह्मपुत्र के उत्तरी छोर, जिसे आम तौर पर लोअर असम कहा जाता है, में चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प है। इस इलाके की 43 विधानसभा सीटों पर भाजपा की ताकत उसका गठबंधन है, जबकि कांग्रेस को उम्मीद है कि दोनों खेमों के मुसलमानों (असमी और बांग्लादेशी कहे जाने वाले) का एक मुश्त समर्थन उसकी नैया पार लगा सकता है। इस इलाके की करीब 33 सीटों पर इत्र कारोबारी बदरुद्दीन अजमल खां की एआईयूडीएफ का भी खासा असर मुसलमानों पर रहा है, लेकिन इस बार ज्यादातर मुस्लिम मतदाताओं का रुझान कांग्रेस के पक्ष में दिखाई दे रहा है। वहीं, असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन करके भाजपा ने अपनी स्थित खासी मजबूत कर ली है।
गुवाहाटी से उत्तर की ओर ब्रह्मपुत्र पार करते ही रियांग, नलबाड़ी होते हुए बारपेटा पहुंचने तक स्थिति साफ होने लगती है। कामरूप जिले के नकुल में मोहम्मद शाहिद कहते हैं कि यहां अजमल का कोई असर नहीं है और हम लोग कांग्रेस के साथ हैं। गुवाहाटी कॉलेज में पढ़ाई कर रहे सुरजीत शर्मा को लगता है कि भाजपा इस बार बेहतर स्थिति में है। दोनों यह मानते हैं कि भाजपा-कांग्रेस का मुकाबला कांटे का है। शर्मा जो खुद को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सदस्य बताते हैं, यह भी कहते हैं कि भाजपा ने यहां कमालपुर के विधायक को मैदान में उतारा है, क्योंकि अगप से समझौते की वजह से कमालपुर सीट उसके पास चली गई है। इसलिए स्थानीय बनाम बाहरी का चुनावी मुद्दा भी उठ रहा है।
लोकसभा चुनावों में इस इलाके में भाजपा को जबरदस्त कामयाबी मिली थी। लोग कहते हैं कि हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर पहली बार भाजपा के लिए वोट डाला था। बांग्लादेशी मुसलमानों को बाहर निकालने के मोदी के वादे ने असम के मूल निवासियों को भाजपा के पक्ष में और बांग्लादेशी कहे जाने वाले मुसलमानों को यूडीएफ के पक्ष में गोलबंद कर दिया था, लेकिन अब हालात बदले हैं। केंद्र सरकार के दो साल हो चुके हैं और कथित बांग्लादेशी मुसलमान पहले की ही तरह रह रहे हैं। इससे यह मुद्दा दोनों ही पक्षों में नरम पड़ गया है। भाजपा अब 15 साल के कांग्रेस राज को हटाकर बदलाव का नारा दे रही है, वहीं कांग्रेस सामाजिक तानेबाने को एकजुट रखने और गोगोई की असमिया छवि को भुनाने में जुटी है।
भाजपा के पक्ष में एक हिंदू एकजुटता भी दिखाई पड़ती है, लेकिन जैसे-जैसे आप मुस्लिम बहुल इलाकों में पहुंचते हैं, कांग्रेस नजर आने लगती है। वहीं, बारपेटा के फतसला में चाय की दुकान पर बैठे अनूप चौधरी व अन्य कहते हैं कि इस बार भाजपा की हवा है। नलबाड़ी जिले की बोरमा विधानसभा में भाजपा के सहयोगी दल बोडो पीपुल्स फ्रंट का बोलबाला है। बीपीएफ कार्यकर्ता अतुल दास कहते हैं कि यहां भाजपा को कोई नहीं जानता था लेकिन बीपीएफ की वजह से भाजपा भी घर-घर पहुंच गई है। लेकिन बारपेटा के राजा खाट में एक मस्जिद के किनारे खड़े शाहजहां अली, मोहम्मद खलील कहते हैं कि मुकाबला तिकोना है। इनके मुताबिक लोअर असम के मुस्लिम बहुल गांवों में फिर से कांग्रेस के पक्ष में माहौल बन रहा है। फिर भी अजमल खां के एआईयूडीएफ को अनदेखा नहीं किया जा सकता।