जब चीनी अधिकारियों को अपने सैनिकों के बारे में पता चला तो उन्होंने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने भारी संख्या में चीनी सैनिकों को हथियारों के साथ भेजा। चीनी सैनिकों के पास तोप, मोर्टार, 106 आरसीएल और 132 एमएम रॉकेट थे। लेकिन भारत के पास न तो तोपखाना था और न ही कोई मोर्टार। चीनी लगातार हमले कर रहे थे। भारत के पास अब केवल अपने हाथों का सहारा बचा था।
इस कठिन परिस्थिती में भी शैतान सिंह ने हार नहीं मानी और अपनी टुकड़ी की हिम्मत बढ़ाते रहे। चीनी सैनिकों की निगाहें भी मेजर शैतान सिंह पर टिकी थीं। उन्होंने शैतान सिहं के हाथ में एलएमजी की गोली से हमला किया, फिर भी वह अपनी जान की परवाह न करते हुए चीनियों के आगे टिके रहे। इसके बाद एक अन्य गोली उनके पेट में लगी। लेकिन वह जवानों को कहते रहे कि बटालियन हेडक्वार्टर में जाकर सूचना दें।
वह खुद ही अपनी मरहम पट्टी करने लगे। लेकिन हेडक्वार्टर से रेडियो संपर्क भी तब तक टूट चुका था और फोन लाइन भी कट गई थी। उन्होंने दुश्मनों के आगे हार नहीं मानी और शहीद हो गए। इस बड़ी हार के बाद चीन ने 21 नवंबर, 1962 को युद्ध खत्म करने की घोषणा की।
इस युद्ध में भारत के 123 में से 109 सैनिक शहीद हुए। इस कंपनी का नाम 13-कुमाऊं रेजिमेंट में चार्ली कंपनी से बदलकर रेजांग ला कंपनी कर दिया गया। यहां शहीद हुए जवानों के शव बर्फ से ढके पाए गए। उसी स्थान पर मेजर शैतान सिंह का शव भी मिला। मृत्योपरांत साल 1963 में शैतान सिंह को सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।