सार
बायोमेडिकल कचरे के निपटान को लेकर देश के 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नियमों की अनदेखी सामने आई है। सीपीसीबी ने एनजीटी को बताया कि 9,178 स्वास्थ्य केंद्रों में सिर्फ 5,715 ही तय नियमों के मुताबिक मिले। उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सभी संबंधित केंद्र नियमों का पालन करते नहीं पाए गए। अब सवाल है कि आठ सप्ताह में सुधार नहीं हुआ तो सरकार क्या कार्रवाई करेगी? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
आठ सप्ताह में सुधार नहीं हुआ तो क्या कार्रवाई होगी?
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बायोमेडिकल यानी अस्पतालों से निकलने वाले कचरे के निपटान को लेकर देश के कई राज्यों में गंभीर लापरवाही सामने आई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण को बताया है कि 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बायोमेडिकल कचरे के निपटान से जुड़े नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। मामला अस्पतालों में कचरे को जमीन में गहराई तक दबाकर निपटाने यानी ‘डीप बरीअल’ से जुड़ा है। इस व्यवस्था में नियमों की अनदेखी पर्यावरण और भूजल के लिए खतरा पैदा कर सकती है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश के सभी 111 और राजस्थान के सभी 33 संबंधित स्वास्थ्य केंद्र नियमों का पालन करते नहीं मिले।
9,178 स्वास्थ्य केंद्रों में कितने नियमों के मुताबिक मिले?
सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 9,178 स्वास्थ्य केंद्र बायोमेडिकल कचरे के लिए ‘डीप बरीअल’ व्यवस्था का इस्तेमाल कर रहे थे। इनमें केवल 5,715 स्वास्थ्य केंद्र ही तय मानकों के अनुरूप पाए गए। यानी बड़ी संख्या में केंद्रों पर नियमों का पालन नहीं हो रहा था। सबसे बड़ी खामी 477 स्वास्थ्य केंद्रों में मिली, जहां कचरा दबाने वाली जगह और भूजल स्तर के बीच कम से कम छह मीटर की दूरी बनाए रखने के नियम का पालन नहीं किया गया। इसके अलावा 341 स्वास्थ्य केंद्रों के पास संबंधित प्राधिकरण की जरूरी मंजूरी भी नहीं थी। यह स्थिति बताती है कि कचरे के निपटान में सिर्फ व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि जरूरी अनुमति और सुरक्षा मानकों की भी अनदेखी हुई है।
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डीप बरीअल के लिए क्या नियम हैं?
बायोमेडिकल कचरे को जमीन में गहराई तक दबाना सामान्य तरीका नहीं है। बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के तहत इसकी अनुमति केवल ग्रामीण या दूरदराज के इलाकों में सीमित परिस्थितियों में है, जहां साझा बायोमेडिकल कचरा उपचार सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके लिए संबंधित राज्य प्राधिकरण से पहले मंजूरी लेना जरूरी है। साथ ही कचरे को दबाने वाली जगह और भूजल स्तर के बीच कम से कम छह मीटर की दूरी होनी चाहिए। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अस्पतालों से निकलने वाला संक्रमित या खतरनाक कचरा मिट्टी और भूजल को प्रदूषित न करे। लेकिन जांच में कई केंद्र इन बुनियादी शर्तों पर ही खरे नहीं उतरे।
आठ सप्ताह में सुधार नहीं हुआ तो क्या कार्रवाई होगी?
सीपीसीबी ने एनजीटी को बताया है कि नियम तोड़ने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के संबंधित प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों को सूचना भेजी गई है। इन्हें नियमों का पालन करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया है। अगर तय अवधि में सुधार नहीं हुआ तो पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत निर्देश जारी किए जा सकते हैं। इस प्रावधान के तहत केंद्र सरकार बाध्यकारी आदेश जारी कर सकती है। इसमें किसी गतिविधि को नियंत्रित करने या बंद करने और बिजली-पानी जैसी सेवाओं को रोकने तक की कार्रवाई शामिल हो सकती है। यानी राज्यों के सामने अब नियमों का पालन करने और कमियों को दूर करने की स्पष्ट समयसीमा है।
एनजीटी ने आगे क्या निर्देश दिया है?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण इस मामले में बायोमेडिकल कचरे के उपचार, रखरखाव और निपटान से जुड़ी कमियों की निगरानी कर रहा है। अधिकरण ने सीपीसीबी को आगे की कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह रिपोर्ट अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले देनी होगी। अगली सुनवाई 28 अक्तूबर 2026 को होनी है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आठ सप्ताह की अवधि में नियमों का पालन कराने के लिए राज्य क्या कदम उठाते हैं और खासकर उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में सभी संबंधित स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति में कितना सुधार होता है।