महाराष्ट्र के साथ ताजा सीमा विवाद को लेकर हंगामे के बीच कर्नाटक में राज्य विधानमंडल का शीतकालीन सत्र भी जारी है। चुनाव के लगभग पांच महीने के पहले हो रहा यह सत्र भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि महाराष्ट्र के सीमा विवाद चल रहा है और मौजूदा भाजपा सरकार का यह आखिरी सत्र होगा। वहीं, सत्र के दूसरे दिन यानी मंगलवार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के लिए आरक्षण बढ़ाने का बिल कर्नाटक विधानसभा में पेश किया गया।
एससी-एसटी के लिए आरक्षण की सीमा में बढ़ोतरी के लिए लागू अध्यादेश को कानून बनाने के लिए बोम्मई सरकार ने कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विधेयक, 2022 पेश किया। गौरतलब है कि अक्तूबर माह में कर्नाटक सरकार ने कर्नाटक सरकार ने को सर्वसम्मित से राज्य में अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए आरक्षण 15 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए 3 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी करने के लिए एक अध्यादेश को मंजूरी दी थीा। है। उससे पहले, कर्नाटक कैबिनेट ने बीते आठ अक्तूबर को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का आरक्षण बढ़ाने के लिए अपनी औपचारिक सहमति दे दी थी। अब अध्यादेश पर राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद अध्यादेश को जारी कर दिया जाएगा।
बिल में कहा गया है कि चूंकि मामला जरूरी था और उस समय राज्य विधानमंडल के दोनों सदन सत्र में नहीं थे। ऐसे में अध्यादेश को 23 अक्टूबर की अधिसूचना के माध्यम से प्रख्यापित किया गया था। साथ ही अध्यादेश के सभी प्रावधान 1 नवंबर से लागू भी हो गए थे। अब जबकि विधानसभा का सत्र जारी है तो अध्यादेश को बिल के रूप में परिवर्तित किया जाए।
राज्य सरकार ने यह फैसला न्यायमूर्ति एच. एन. नागमोहन दास आयोग की रिपोर्ट के आधार पर लिया है। इस आयोग ने एससी आरक्षण 15 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी करने की सिफारिश की थी, इसके अलावा एसटी आरक्षण को 3 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी करने की सिफारिश की थी। आयोग ने जुलाई 2020 में सरकार को अपनी सिफारिशें दीं थीं।
बोम्मई सरकार के इस फैसले के बाद राज्य में आरक्षण की संख्या 56 प्रतिशत तक चली जाएगी। हालांकि एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत तय की थी। ऐसे में विपक्षी दल सरकार से सवाल कर रहे हैं कि वे इसे कैसे लागू करेंगे।
विपक्ष इसे लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष के नेता सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस ने स्पीकर विश्वेश्वर हेगड़े कागेरी को विधानसभा में प्राथमिकता के आधार पर आरक्षण वृद्धि के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए स्थगन प्रस्ताव के लिए याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का कदम राजनीति से प्रेरित है और इसका कोई वास्तविक सरोकार नहीं है।