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Bihar: क्षेत्रीय नेता की छवि से ऊपर क्यों नहीं उठ पा रहे हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उर्फ 'मुन्ना'?

सार

नीतीश कुमार कद्दावर क्षेत्रीय नेता हैं। लेकिन बिहार से बाहर उनका और उनकी पार्टी का जनाधार बहुत कम है। हालांकि कुर्मी बिरादरी से आने वाले नीतीश कुमार की यह जाति बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, गुजरात समेत कई राज्यों में है। 2014 का लोकसभा चुनाव उनके दल ने बिहार में अकेले लड़ा था। लेकिन 02 सीटें ही जीत सका था...
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Bihar: Nitish Kumar - फोटो : Amar Ujala/ Himanshu Bhatt
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विस्तार
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सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखो आगे क्या-क्या होता है? राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता रश्मि रथी की यह पंक्तियां नीतीश कुमार की तरफ ध्यान ले जाती हैं। नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के गजब के व्यक्तित्व हैं। उनकी जरूरत एनडीए को भी है और विपक्षी दलों को भी। जब चाहते हैं, इधर और उधर होते रहते हैं। राजनीतिक जीवन में नीतीश कुमार ने कभी व्यक्ति, संगठन, दल से मोह नहीं किया। जब चाहा जिसे छोड़ा, जिसे अपनाया और राजनीति की जरूरत बने रहे। उनकी पार्टी के नेता और मंत्री विजय चौधरी उन्हें प्रधानमंत्री मैटेरियल (प्रधानमंत्री के काबिल) बताते हैं। पूर्व अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह उन्हें प्रधानमंत्री पद के काबिल बताते नहीं थकते थे। राष्ट्रीय प्रवक्ता और नीतीश कुमार के राजनीतिक सलाहकार केसी त्यागी अपने नेता का सम्मान इन्हीं शब्दों से करते हैं।

नीतीश कुमार का उपनाम 'मुन्ना' है। उनके पिता कविराज राम लखन वैद्य के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानी थे। विद्युत इंजीनियरिंग के डिग्रीधारी नीतीश कुमार ने बिहार राज्य बिजली बोर्ड को भी अपनी सेवाएं दी हैं। यह कहने में भले व्यंग्य की तरह लगे, लेकिन कदाचार के दाग से मुक्त 72 साल के नीतीश कुमार 1970 के दशक से राजनीति में हैं। तब से उनमें बिजली सी राजनीतिक ऊर्जा है और बिजली की भांति राजनीति में सहयोगियों को झटके भी दे रहे हैं। फिलहाल वह उन्होंने 9वीं बार बिहार के 22 मुख्यमंत्री के रूप में 28 जनवरी को शपथ ली है।

एक क्षेत्रीय नेता से अब तक ऊपर नहीं उठ पाए नीतीश कुमार

राष्ट्रीय राजनीति में समय-समय पर क्षितिज पर चर्चित रहने वाले नीतीश कुमार 1974 से सक्रिय राजनीति में हैं। पांच दशक में नीतीश कुमार के साथ बिहार के दर्जन भर से अधिक नेताओं की राय भी उन्हें लेकर गजब की है। शिवानंद तिवारी भी निजी तौर पर नीतीश की आलोचना नहीं करते। हालांकि इस बार नीतीश के पाला बदलने से वह नाखुश हैं। जद(यू) के संस्थापक शरद यादव कहते थे कि तमाम खूबियों के बाद नीतीश कुमार कब क्या करेंगे, कहा नहीं जा सकता। अस्थिर सोच और व्यवहार के नेता हैं। 2015 में नीतीश कुमार के साथ काम कर चुके प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार ने अपना राजनीतिक सलाहकार बनाकर कैबिनेट का दर्जा तक दिया था। प्रशांत किशोर कहते हैं कि नीतीश कुमार कब क्या करेंगे, यह उन्हें भी पता नहीं है। 50 साल सक्रिय राजनीति में देने के बाद भी अभी एक क्षेत्रीय नेता के तौर पर गिने जाते हैं। जबकि नीतीश कुमार ने 1974-77 में जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में हिस्सा लिया था। यहीं से उनकी लालू प्रसाद यादव, सुशील कुमार मोदी, शिवानंद तिवारी जेसे तमाम युवा नेताओं का साथ मिला। सत्येन्द्र नारायण सिन्हा जैसी शख्सियत के करीब आए और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जन नायक कर्पूरी ठाकुर जैसा राजनीतिक गुरु मिला। 1985 में पहली बार नीतीश कुमार बिहार विधानसभा के सदस्य भी बने। 1989 में उन्हें लोकसभा का सदस्य बनने में सफलता मिली।

छह बार के सांसद, कई बार बने केंद्रीय मंत्री

1985 में विधायक और 1989 में लोकसभा का सदस्य बनने के बाद नीतीश कुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1990 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में कृषि राज्य मंत्री बन गए थे। 1998-99 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में जगह देकर रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री बनाया था। 2000 में उन्हें केंद्रीय कृषि मंत्री और 2001-04 तक वह फिर केंद्रीय रेल मंत्री रहे। इस तरह से वह छह बार लोकसभा सदस्य के तौर पर चुने गए। 2004 में नीतीश कुमार ने बाढ़ और नालंदा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा था। इनमें उन्हें नालंदा से सफलता मिली। बाढ़ से हार गए थे। लेकिन इसके एक साल बाद बिहार में एनडीए गठबंधन ने बहुमत हासिल किया और वह राज्य के मुख्यमंत्री बनाए गए। नीतीश कुमार 2005 से अब तक लगातार 9 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेकर 17 मई 2014 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया, जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री (276 दिन के लिए) बनवाया और 15 फरवरी को फिर मांझी को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन गए। वह दो बार एनडीए को छोड़कर तीसरी बार उसमें वापसी कर चुके हैं। दो बार महागठबंधन का साथी बनकर उसका दो बार साथ छोड़ चुके हैं।

...लेकिन बिहार से बाहर नहीं रखते जनाधार

नीतीश कुमार कद्दावर क्षेत्रीय नेता हैं। लेकिन बिहार से बाहर उनका और उनकी पार्टी का जनाधार बहुत कम है। हालांकि कुर्मी बिरादरी से आने वाले नीतीश कुमार की यह जाति बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, गुजरात समेत कई राज्यों में है। 2014 का लोकसभा चुनाव उनके दल ने बिहार में अकेले लड़ा था। लेकिन 02 सीटें ही जीत सका था। 15.39 फीसदी मत मिला था। लोकसभा में इस समय जद(यू) के 16, राज्यसभा में 05 सदस्य हैं। बिहार विधानसभा में 45 सीटें हैं। मणिपुर विधानसभा में एक सदस्य है। बिहार की 16वीं विधानसभा का 2025 में 101 सीटों पर महागठबंधन के साथ चुनाव लड़कर उनके दल ने 71 पर विजय पाई थी। 16.8 फीसदी वोट मिले थे। 2020 में एनडीए के साथ 115 सीटों पर चुनाव लड़ा। 15.39 फीसदी मतों के साथ 43 सीटें मिलीं। इस चुनाव में भाजपा को जद(यू) के मुकाबले 19.46 फीसदी वोट मिले। राष्ट्रीय जनता दल के खाते में 23.11 फीसदी वोट आया। जबकि 2005 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) की सबसे अधिक और 88 सीटें, जबकि वोट 20.46 प्रतिशत था। दूसरे नंबर पर 55 सीट, 15.65 फीसदी वोट के साथ भाजपा और तीसरे पर और 54 सीटों, 23.45 फीसदी वोट के साथ राष्ट्रीय जनता दल। बिहार में भी नीतीश कुमार की पार्टी जद(यू) ने अब तक सबसे अच्छा प्रदर्शन एनडीए के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव 2010 में किया था। इसमें जद(यू) को 141 सीट पर लड़कर 115(22.58 प्रतिशत वोट) मिले थे। इसी चुनाव में नीतीश कुमार सुशासन बाबू बने थे। उनकी पार्टी बहुमत से महज 7 सीट दूर थी। यह भी सही है कि कभी उनके दल को विधानसभा पूर्ण बहुमत नहीं मिला।  

ऐसा कोई सगा नहीं जिसका साथ नीतीश ने न छोड़ा हो

फिल्मी लाइन है, लेकिन नीतीश कुमार पर ठीक बैठती है। हालांकि उनके राजनीतिक गुरु कर्पूरी ठाकुर जनहित में किसी के सहयोग को लेना बुरा नहीं मानते थे। नीतीश के मंत्री उनकी पार्टी के नेता और सहयोगी कर्पूरी के इसी तर्क को नीतीश कुमार के पाला बदलने से जोड़ते हुए कहते हैं कि वह बिहार के भले के लिए सब कर रहे हैं। नीतीश कुमार 1990 के दशक में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को बड़े भाई जैसी इज्जत देते थे। छाया की तरह माने जाते थे। 1994 में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद को भनक नहीं लगने दी और उनका साथ छोड़ दिया। समता पार्टी में आए। जार्ज फर्नांडीस इसके संस्थापक थे। शरद यादव के नेतृत्व में 1999 के आम चुनाव के बाद जनता दल से अलग होकर जद(यू) बना था। 30 अक्तूबर 2003 को नीतीश कुमार ने शरद यादव से नजदीकी बढ़ाकर समता पार्टी का जद(यू) में विलय कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नेताओं में उपेंद्र कुशवाहा, पवन वर्मा, प्रशांत किशोर समेत तमाम नाम है, जिन्हें नीतीश कुमार ने जोर का झटका धीरे से दिया। 2013 में नीतीश कुमार ने एनडीए से नाता तोड़ा। 2015 का चुनाव महागठबंधन के साथ लड़े। 2017 में फिर एनडीए में चले गए। इससे शरद यादव काफी निराश हुए और उन्हें नीतीश कुमार ने जद(यू) से बेदखल कर दिया। इससे पहले लगभग इसी तरह की अवस्था से जार्ज फर्नांडीस को भी गुजरना पड़ा था।

2010 के बाद से घट गए सुशासन बाबू

सुशासन बाबू ने बिहार को जंगल राज से मुक्ति दिलाई थी। राजद के नेता रघुवंश बाबू कहते थे कि इसका श्रेय केवल नीतीश कुमार को नहीं है। राजद के सहयोग से यूपीए सरकार चल रही थी। 2004 से 2009 तक यूपीए सरकार और राजद कोटे के मंत्रियों ने बिहार में विकास योजनाओं को बढ़ाने के लिए जमकर सहयोग किया था। अब रघुवंश बाबू नहीं रहे। खैर, 2009 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को 32 सीटें मिली थीं। 20 सीटें जद(यू) के खाते में और 12 भाजपा के पाले में आई थीं। इसके एक साल बाद जद(यू) ने एनडीए के साथ और सुशासन बाबू की छवि पर 2010 का विधानसभा चुनाव लड़ा। 22 फीसदी से अधिक वोट और बहुमत से महज 07 सीट दूर 115 का आंकड़ा छूने में सफल रही थी। इसके बाद जैसे-जैसे नीतीश ने पैंतरे बदले, जद(यू) सिकुड़ती चली गई। बड़े नेता भी रास्ते से हटने को मजबूर होने लगे।

नीतीश कुमार के इंडिया गठबंधन छोडऩे का क्या असर पड़ेगा?

प्रशांत किशोर कहते हैं कि वह लोकसभा की बात नहीं करते। विधानसभा चुनाव 2025 में 20 सीट से अधिक जद(यू) की आने की उम्मीद नहीं है। संजीव सिंह कहते हैं कि जो असर पड़ेगा, वह केवल बिहार में। बिहार में एनडीए को सीटों में फायदा हो सकता है। जद(यू) की 2019 की तुलना में सीटें घट सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप कुमार कहते हैं कि कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। बस भाजपा का नुकसान रुक जाएगा। प्रदीप कुमार के अनुसार पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को चुनाव जीतने के लिए नीतीश कुमार की जरूरत नहीं है। झारखंड में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी का प्रभाव जगजाहिर है। गुजरात में नीतीश कुमार और उनके दल के पास प्रभावित करने के लिए कुछ नहीं है। महाराष्ट्र, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत तमाम राज्यों में वह कोई जनाधार नहीं रखते। सच पूछिए तो इंडिया गठबंधन को इन राज्यों में नीतीश की जरूरत ही नहीं है। इतना ही नहीं पड़ोस के राज्य उत्तर प्रदेश में जद(यू) के प्रदर्शन और वोटों की संख्या के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। वह कहते हैं कि नीतीश जिस बिरादरी से हैं, उसके बड़ी संख्या में पहले से वोट एनडीए के पाले में हैं।

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