बढ़ी मुश्किल
महागठबंधन के लिए मुश्किल केवल यह नहीं है कि कांग्रेस अपने लिए ज्यादा सीटें मांग रही है। पिछली बार एनडीए खेमे में रहकर चुनाव लड़ने वाले मुकेश सहनी इस बार महागठबंधन खेमे में आ चुके हैं। उनका एनडीए से पत्ता केवल इसीलिए कटा था क्योंकि वे सरकार में अपने कद से ज्यादा दावेदारी कर रहे थे। लेकिन उनके तेवर महागठबंधन में आकर भी कम नहीं हुए हैं। इस बार वे भी अपने लिए 40 सीटों पर दावेदारी कर रहे हैं।
बिहार की राजनीति के जानकार राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने अमर उजाला से कहा कि वामपंथी दलों के लिए भी बिहार-झारखंड का चुनाव जीने-मरने का प्रश्न होता है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में सत्ता से उखड़ने के बाद वामपंथी दलों के लिए इन राज्यों के अलावा बिहार, झारखंड और केरल में ही उम्मीदें बची हैं। वे यहां कुछ सीटों पर जीत हासिल कर अपनी दावेदारी बनाए रखना चाहते हैं। यही कारण है कि इस बार वे भी बिहार में अपने लिए संयुक्त रूप से 40 से 50 सीटों पर दावेदारी कर रहे हैं।
शीर्ष नेताओं की बैठक में होगा निर्णय
एक राजद नेता ने अमर उजाला से कहा कि चुनाव के समय यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। सभी दल अपने लिए ज्यादा सीटों की दावेदारी करते हैं। लेकिन सभी दलों के शीर्ष नेताओं की बैठक में इस मुद्दे का हल निकाल लिया जाएगा। नेता का दावा है कि इस बार जनता सत्ता में बदलाव के मन में है और इस बार महागठबंधन के सत्ता में आने की पूरी संभावना है।