बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विपक्षी नेताओं ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि नागरिकता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, आपने इसे राजनीतिक रंग दे दिया और इसे छिपाने की कोशिश की, जबकि असली मुद्दा नागरिकता का ही है। बिहार में चुनाव बहिष्कार को लेकर विपक्षी गठबंधन इंडिया ने अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है, लेकिन सभी विकल्प खुले हैं।
सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग को 'संस्थागत अहंकार' नहीं दिखाना चाहिए और बिहार में जारी एसआईआर की प्रक्रिया को रोक देना चाहिए। पटना में भाकपा (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, राजद सांसद मनोज झा और माकपा नेता निलोत्पल बसु के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिंघवी ने कहा कि यह प्रक्रिया अब एक तरह की 'नागरिकता परीक्षा' बन गई है और इसकी वैधता पर सवाल उठ रहे हैं।
उन्होंने चुनाव आयोग से अनुरोध किया की कि वह विधानसभा चुनावों से पहले इस फैसले को वापस ले। उन्होंने कहा कि यह कोई राजनीतिक जिद या संस्थागत अहंकार का मामला नहीं होना चाहिए। उन्होंने आयोग से निवेदन किया कि वह फिर से विचार करे, क्योंकि सभी लोग यही मांग कर रहे हैं।
उन्होंने पूछा कि जब जनवरी में ही एक संशोधन किया गया था तो दो महीने बाद चुनाव से ठीक पहले इतनी जल्दी में यह प्रक्रिया क्यों करवाई जा रही है? उन्होंने यह भी कहा कि आयोग की ओर से दिए गए बयानों से लगता है कि यह एक तरह का नागरिकता सत्यापन अभियान है, क्योंकि आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को स्वीकार नहीं किया जा रहा। इसका मतलब है कि आयोग नागरिकता का प्रमाण मांग रहा है, जबकि यह अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है।
सिंघवी ने कहा कि अदालत इस पूरी प्रक्रिया के कानूनी पक्ष की जांच करेगी, लेकिन अगर चुनाव आयोग अपने अहंकार और जिद को छोड़ दे तो वह अभी भी इस अभ्यास को रोक सकता है और इसे चुनाव के बाद करवा सकता है। उन्होंने कहा कि इसे चुनाव से जोड़ने की कोई जरूरत नहीं है।
पारदर्शिता से दूर है पूरी प्रक्रिया: दीपंकर भट्टाचार्य
वहीं, दीपंकर भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग खुद ही अपने दावों से हमारी आशंकाओं की पुष्टि कर रहा है। उन्होंने कहा कि आयोग का दावा है कि 65 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाएंगे, जो बेहद चिंताजनक है। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग ने यह गलत दावा किया है कि उसने राजनीतिक दलों को प्रक्रिया की जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि जो फॉर्म लंबित हैं, उनका डाटा ही राजनीतिक दलों को मिला है और यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता से दूर है।
किसी राजनीतिक दल की नहीं ली गई राय: मनोज झा
वहीं, राजद सांसद मनोज झा ने कहा, जब मुख्य चुनाव आयुक्त (ज्ञानेश कुमार) ने कार्यभार संभाला था, तब उन्होंने कहा था कि वह कोई भी फैसला राजनीतिक दलों से सलाह के बिना नहीं लेंगे। मुझे लगता है कि पिछले 22 वर्षों में इससे बड़ा कोई फैसला नहीं हुआ (बिहार एसआईआर की बात करते हुए), लेकिन किसी भी राजनीतिक दल से कोई राय नहीं ली गई। माकपा नेता निलोत्पल बसु ने इसे गरीबों के अधिकारों पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि हमारा लोकतंत्र सबको शामिल करने वाला है और इस तरह की प्रक्रिया लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है।
वहीं, चुनाव आयोग ने रविवार को बताया कि इस गहन पुनरीक्षण अभियान के तहत बिहार में 7.24 करोड़ यानी 91.69 प्रतिशत मतदाताओं के फॉर्म प्राप्त हो चुके हैं। आयोग ने यह भी कहा कि अब तक 22 लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है, 36 लाख लोग या तो स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं या घर पर नहीं मिले और सात लाख लोगों के नाम एक से अधिक जगहों पर दर्ज पाए गए हैं।
एसआईआर पर क्यों हो रहा विवाद
24 जून को चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर का निर्देश दिया था। यह 25 जून से 26 जुलाई 2025 के बीच होना था। चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में फर्जी, अयोग्य और दो जगहों पर पंजीकृत मतदाताओं को हटाने के उद्देश्य से पुनरीक्षण किया जा रहा है। वहीं, विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग इस विशेष गहन पुनरीक्षण के जरिए पिछले दरवाजे से लोगों की नागरिकता की जांच कर रहा है। साथ ही विपक्ष का आरोप है कि इसकी आड़ में बड़े पैमाने पर लोगों से मतदान का अधिकार छीना जा सकता है।
हालांकि, चुनाव आयोग ने आश्वासन दिया है कि अगर कोई व्यक्ति मतदाता सूची से बाहर हो जाए, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि उसकी नागरिकता समाप्त हो गई है। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि कानून और संविधान के तहत उसे यह अधिकार प्राप्त है कि वह नागरिकता से जुड़े दस्तावेज मांग सके, ताकि लोगों को मताधिकार मिल सके।