भाजपा को देश से उखाड़ फेंकने के मंसूबे के साथ अस्तित्व में आया महागठबंधन दो साल तक ही चल पाया। इसके जन्म की शुरुआत से ही इसकी कामयाबी पर संदेह जताने वालों की कमी नहीं थी क्योंकि इसमें राजद और जदयू जैसे दो परस्पर विरोधी पार्टियां शामिल हुईं थी, जिसके नेता इससे पहले एक-दूसरे को फूटी आंख भी नहीं सुहाते थे।
हालांकि जब इस राजनीतिक मोर्चे ने लोकसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद बिहार फतह करने निकले भाजपा के विजय रथ को रोक दिया तो ऐसा लगा कि केंद्र सरकार को चुनौती देने की जमीन तैयार हो रही है, लेकिन राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के परिवार पर भ्रष्टाचार के छींटे लगने के बाद तो यह स्पष्ट हो गया कि अब इसके गिने-चुने दिन ही बचे हैं।
- राज्य में 2015 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लालू प्रसाद की पार्टी राजद, नीतीश की जदयू और कांग्रेस ने मिलकर महागठबंधन का एलान किया। पहले इसमें मुलायम सिंह की सपा और शरद पवार की एनसीपी भी शामिल थी लेकिन बाद में दोनों पार्टियां इससे अलग हो गईं।
- जदयू और राजद ने 100-100 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि कांग्रेस को 40 सीटें दी गईं। राजनीतिक पंडितों ने इसे बेमेल गठजोड़ करार देते हुए हैरानी जताई कि लालू को भ्रष्टाचार का जीता-जागता उदाहरण मानने वाले नीतीश ने उन्हें कैसे गले लगाया, लेकिन सारे अनुमानों को धता बताते हुए महागठबंधन को चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिला और नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी।
- दो साल तक सब कुछ ठीक चला लेकिन मई, 2017 में 1000 करोड़ की बेनामी संपत्ति के मामले में लालू प्रसाद के दिल्ली-एनसीआर के 22 ठिकानों पर आयकर छापे से दोनों के रिश्तों में नया मोड़ आया। लालू ने आरोप लगाया कि यह नीतीश के इशारे पर हुआ है।
- जुलाई के पहले हफ्ते में सीबीआई ने लालू उनकी पत्नी राबड़ी, छोटे बेटे और राज्य के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव सहित आठ लोगों व इकाइयों के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया। आरोप है कि रेल मंत्री रहते लालू ने एक कंपनी को नियमों का उल्लंघन कर फायदा पहुंचाया जिसके बदले में उन्हें कंपनी ने पटना में करोड़ों की जमीन दी।
- इसके बाद रिश्तों में खटास और बढ़ गई। नीतीश ने भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की घोषणा करते हुए तेजस्वी को इशारों में इस्तीफा देने का संकेत दिया लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों ओर से राजनीतिक बयानबाजी होती रही। इसकी परिणति मुख्यमंत्री के इस्तीफे के रूप में हुई।