दो दशक में पार्टी का सबसे बेहतर प्रदर्शन
विधानसभा में भाजपा-जदयू के सामने अड़कर चिराग ने 29 सीटें हासिल की और 19 पर जीत गए। उन्होंने न सिर्फ अपनी पार्टी को पुनर्जीवित किया, बल्कि दो दशक में उसे अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के करीब ले गए। इससे पहले, लोजपा ने फरवरी, 2005 के चुनाव में 29 सीटें जीती थीं। तब त्रिशंकु विधानसभा बनी थी। उसी साल दोबारा चुनाव में लोजपा को सिर्फ 10 सीटें ही मिलीं। तब से यह उसकी सबसे ज्यादा सीटें हैं।
युवा महत्वाकांक्षा के प्रतीक
चिराग ने भाजपा से करीबी दिखाते हुए अपने पत्ते अच्छी तरह से खेले। जरूरत पड़ने पर खिलाफ भी बोले, खासकर जब अल्पसंख्यकों के मुद्दों की बात आई। विकास के लिए स्पष्ट नजरिया पेश कर ऐसे नेता की छवि को सामने रखा, जो युवाओं के मन की बात जानता था। 43 साल की उम्र में वह ऐसे नेता बनकर उभरे, जिसकी युवाओं को तलाश है। वह युवा मतदाताओं की आकांक्षाओं के प्रतीक हैं।
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वोट बैंक को संभाले रखा
चिराग ने 2020 में एनडीए से बाहर रहकर विधानसभा चुनाव लड़ा। इसका खामियाजा उनके साथ एनडीए को भी भुगतना पड़ा। चिराग की पार्टी को खुद एक ही सीट मिली, लेकिन भाजपा-जदयू गठबंधन भी मुश्किल से बहुमत हासिल कर पाया। मगर खास बात यह है कि इस दौरान भी चिराग ने अनुसूचित जाति के अपने करीब पांच फीसदी कोर वोट बैंक को संभाले रखा। इससे स्पष्ट हो गया कि बिहार में उनके बिना किसी गठबंधन को बड़ी सफलता मिलना मुश्किल है।
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