8वीं बार सीएम पद की शपथ लेंगे नीतीश
- मार्च 2000
- नवंबर 2005
- नवंबर 2010
- फरवरी 2015
- नवंबर 2015
- जुलाई 2017
- नवंबर 2020
- अगस्त 2022
महाराष्ट्र में कमाया तो बिहार में गंवाया
बीते महीने भाजपा ने महाराष्ट्र में जो कमाया था उसे इस महीने बिहार में गंवा दिया। जदयू के पाला बदलने के बाद भाजपा के पास फिलहाल नई सरकार में अंतर्विरोधाें की शुरुआत होने का इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। अगर यह सरकार लंबी चली और ठीक से चली तो पार्टी की मुश्किलें कम होने के बदले और बढ़ेंगी।
दरअसल नीतीश कुमार और जदयू बीते डेढ़ दशक से राज्य की राजनीति का संतुलन और सत्ता की चाबी हैं। 2005 से अब तक जदयू जिसके साथ रहा है, राज्य की सत्ता भी उसे ही मिली। वहीं, राजद का अपना एक मजबूत वोट बैंक है। दोनों दलों के साथ आने से भाजपा का गैर यादव पिछड़ा कार्ड मजबूती से जमीन पर नहीं उतर सकता।
दमदार चेहरे की कमी
- 2005 के बाद से राज्य में भाजपा का आधार अगड़ों के साथ अति पिछड़ों और दलितों में भी बढ़ा है। मगर तब उसे जदयू सहित अन्य छोटे दलों का साथ मिला।
- जदयू के राजग से जाने के बाद 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा बुरी तरह से हारी। पार्टी के पास ऐसा बड़ा चेहरा नहीं है, जो नीतीश या तेजस्वी को टक्कर दे सके।
अंतर्विरोध की है गुंजाइश
भाजपा को उम्मीद है कि नई सरकार में जल्द ही अंतर्विरोध के स्वर उपजेंगे। खासतौर पर कानून व्यवस्था बिगड़ेगी। इससे भाजपा को लाभ होगा। नीतीश 2015 से 2017 तक राजद, कांग्रेस के सहयोग से सरकार चला चुके हैं, मगर कलह के चलते उन्होंने फिर भाजपा का दामन थामा था।
लोकसभा चुनाव होगा टर्निंग प्वाइंट
आगामी लोकसभा चुनाव राज्य की सियासत के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है। साल 2014 में भी जदयू के अलग होने के बाद भी भाजपा-लोजपा गठबंधन को राज्य में जबर्दस्त जीत हासिल हुई थी। भाजपा को लगता है कि ऐसा ही साल 2024 में होगा।
संसद पर भी पड़ सकता है बदली सियासत का असर, राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश हैं जदयू सांसद
बिहार के बदलती राजनीतिक समीकरण का असर संसद पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। राज्यसभा को नए सभापति जगदीप धनखड़ के साथ नए उप सभापति का चेहरा भी देखना पड़ सकता है। उच्च सदन के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह जदयू के राज्यसभा सदस्य हैं। राज्यसभा ने हरिवंश को 14 सितंबर, 2020 को दूसरी बार उप सभापति चुना था।
राजनीति विशेषज्ञों का मानना है कि नीतीश कुमार ने जिस कड़े तेवर के साथ बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ने का एलान किया है, संभव है कि वह हरिवंश को उप सभापति पद से इस्तीफा देने को कहें। दूसरी संभावना है कि उप सभापति पद के मामले में वह गेंद अमित शाह और नरेंद्र मोदी के पाले में डाल दें।
जानकारों के मुताबिक इस हालत में भाजपा को हमेशा यह संशय बना रहेगा कि नाजुक वक्त में हरिवंश केंद्र सरकार के साथ खड़े रहेंगे या नहीं। उधर नीतीश कुमार भी यह भांपना चाहेंगे कि हरिवंश का अपना रुख कैसा रहता है। कहीं वह भी आरसीपी सिंह की तरह भाजपा के साथ सांठ-गांठ कर बड़े राजनीतिक फसल की जमीन तो नहीं तैयार करेंगे।
जानकारों के मुताबिक अगर भाजपा हरिवंश को हटाना चाहे तो उसके सामने दो ही रास्ते हैं। या तो हरिवंश खुद इस्तीफा दे दें। या फिर कानून या संसदीय नियमों के गंभीर उल्लंघन के आरोप में उच्च सदन दो तिहाई वोटों से उन्हें हटाने की प्रक्रिया पूरी करे। हालांकि हरिवंश जैसी साफ छवि वाले उप सभापति को हटाने के लिए बहुमत जुटा पाना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।
पस्त विपक्ष के लिए उम्मीद की किरण, भाजपा से दो-दो हाथ करने के लिए जगेगा नया आत्मविश्वास
भाजपा को अजेय मान कर पस्त हो चुके विपक्ष के लिए बिहार का घटनाक्रम उम्मीद की नई किरण की तरह है। इस नए घटनाक्रम के बाद हिंदी पट्टी क्षेत्र में सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को हवा मिलने और भाजपा के कोर एजेंडे मसलन जनसंख्या नियंत्रण, समान नागरिक संहिता, एनआरसी जैसे मुद्दों पर नए सिरे से सियासी संघर्ष की शुरुआत होने की संभावना है। इनमें खासतौर पर जातिगत जनगणना के सवाल पर हिंदी पट्टी क्षेत्र में नए सिरे से सियासी अभियान की शुरुआत हो सकती है।
गौरतलब है कि चुनाव दर चुनाव मिल रही हार, महाराष्ट्र में हालिया सत्ता परिवर्तन ने कांग्रेस, टीएमसी, सपा सहित विपक्षी दलों के आत्मविश्वास को गहरा झटका दिया था। खासतौर पर महाराष्ट्र में शिवसेना में फूट के बाद राज्य की सत्ता से महाविकास अघाड़ी सरकार की विदाई के बाद से विपक्ष सन्न था, जबकि भाजपा का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। हालांकि बिहार के घटनाक्रम से विपक्ष में अब नए सिरे से आत्मविश्वास जगेगा।
सरकार के प्रदर्शन से तय होगा भविष्य
हालांकि अहम सवाल बिहार की नई सरकार में तालमेल और प्रदर्शन का है। अगर सरकार अपनी साख मजबूत करने में सफल रहती है तो नीतीश विपक्ष की राजनीति की धुरी बनने निकल सकते हैं। स्थिति उलट हुई तो विपक्षी राजनीति की बची खुची उम्मीदें भी दम तोड़ देंगी।
हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को मिलेगी नई हवा
- बिहार में नए सामाजिक समीकरण के बाद हिंदी पट्टी क्षेत्र में सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को नए सिरे से अहमियत मिल सकती है। खासतौर पर बिहार में सत्ताधारी गठबंधन और हिंदी पट्टी की विपक्षी पार्टियां जातिगत जनगणना के सवाल को प्रमुखता देगी।
- बिहार में वैसे भी जदयू और राजद इस मुद्दे पर अरसे से मुखर रहे हैं। उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के विपक्षी दल भी इस मुद्दे को समय-समय पर उठाते रहे हैं। इसके अलावा भाजपा के मूल एजेंडे से जुड़े मुद्दों पर भी विपक्ष और सरकार के बीच नए सिरे से दो-दो हाथ हो सकता है।