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शिक्षा घोटालों के लिए शुरू से बदनाम रहा है बिहार, जानिए पांच बड़े घोटाले

Tue, 06 Jun 2017 04:00 PM IST
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल
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- फोटो : bbc
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बिहार में बोर्ड परीक्षाओं का रिजल्ट जारी होने के बाद 12वीं की परीक्षाओं में एक बार ‌फिर घोटाले की बू आ रही है। जिस तरह आईआईटी का एग्जाम क्लियर करने वाले छात्रों को फिजिक्‍स और मैथ के एग्जाम में फेल कर दिया गया है उससे बोर्ड परीक्षाओं की शुचिता पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं।
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हालांकि अभी ताजा मामले पर कोई कार्रवाई होती उससे पहले ही ईडी ने पिछले साल के टॉपर घोटाले में बड़ी कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी बच्चा राय और बोर्ड अध्यक्ष रहे लालकेश्वर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। बहरहाल बिहार में शिक्षा घोटालों का लंबा इतिहास रहा है।

हकीकत ये है कि किसी भी सरकार ने पुराने अनुभवों से कभी कोई सबक नहीं लिया। पिछले सालभर के अंदर ही टॉपर्स घोटाले के बाद एमफिल घोटाला और शिक्षक घोटाला सामने आ चुका है। आइए डालते हैं बिहार के बड़े शिक्षा घोटालों पर एक नजर-
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टॉपर्स घोटाला

बीते सालों का सबसे चर्चित घोटाला रहा है टॉपर्स घोटाला। पिछले साल आए बिहार बोर्ड के परीक्षा परिणामों में इंटर में टॉप करने वाली छात्रा रूबी राय को लेकर खूब हंगामा मचा था। इंटर में टॉप करने वाली रूबी राय के अपने विषयों की भी जानकारी न होने पर इस घोटाले का खुलासा हुआ और एक के बाद एक परतें खुलती चली गईं।

घोटाले के मास्टरमाइंड के रूप में बच्चा राय का नाम सामने आया। रूबी राय बच्चा राय के विशुन रॉय महाविद्यालय की ही छात्रा थी, इसी कालेज पर छात्रों को टॉप कराने के लिए हेराफेरी कराने के आरोप लगे थे। बरहाल मामले में बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष लालकेश्वर सिंह, उनकी पत्नी उषा सिंह सहित दर्जनभर से लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चुका है, ईडी ने भी शुक्रवार को इस मामले में मुकदमा दर्ज कर लिया।

बीएड डिग्री घोटाला
लगभग दो दशक पहले साल 1995 में बिहार में बीएड डिग्री घोटाला सामने आया था जिसमें राज्य सरकार की खूब छिछालेदार हुई थी। उस दौरान मगध और दरभंगा विश्वविद्यालय के माध्यम से यूपी और राजस्‍थान के कई कालेजों को बीएड की मान्यता दी गई थी जिसके बाद कालेजों ने ढाई-ढाई लाख रुपये में बीएड की डिग्रियां बांटी थीं। मामले में बिहार निगरानी ब्यूरो ने साल 1999 में मुकदमा दर्ज किया। जिसके बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री जयप्रकाश यादव को जेल भी जाना पड़ा था। शिक्षा राज्यमंत्री रहे और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी किसी तरह जमानत पाकर जेल जाने से बच पाए थे।
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मेडिकल प्रवेश परीक्षा घोटाला

साल 2002 में एक और परीक्षा घोटाले ने राज्य की खूब बदनामी करवाई। 2002 में मे‌डिकल के लिए हुई प्रवेश परीक्षा का खुलासा बिहार निवासी डा. रंजीत की दिल्‍ली से गिरफ्तारी के बाद हुआ था। गिरफ्तारी के बाद सामने आया कि सैकडों छात्रों को मेडिकल में प्रवेश दिलाने के लिए प्रवेश परीक्षा में घोटाला किया गया।

शिक्षक घोटाला
बिहार में छात्रों के ही घोटाले सामने नहीं आए शिक्षक घोटाले का दंश भी सूबे पर लग चुका है। साल 2011 से 2013 के बीच 94 हजार शिक्षकों की वैंकेसी निकाली गई ‌थी। जिसमें काफी संख्या में फर्जी शिक्षक सर्टिफिकेट में धांधली कर नौकरी पा गए। लेकिन मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो 3000 शिक्षकों ने खुद ही नौकरी से इस्तीफा दे दिया। मामले में 40 हजार शिक्षकों के सर्टिफिकेट जांच के दायरे में हैं। 

एमफिल घोटाला
टॉपर्स घोटाले के बाद बिहार में एक और घोटाला सामने आया। मुजफ्फरपुर के बिहार विश्वविद्यालय में हुए एमफिल घोटाले ने राज्य की उच्च शिक्षा पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया। यह अपनी तरह का बड़ा अजीब घोटाला था जिसमें बिना राजभवन और यूजीसी की अनुमति के दुरस्‍थ शिक्षा विभाग के एक अधिकारी लल्लन सिंह ने एमफिल में पत्राचार कोर्स शुरू करवा दिया।

दो साल तक तीन हजार छात्रों से नौ करोड़ रुपये की रकम भी ऐंठ ली। कमाल की बात ये रही कि दो साल तक यूनिवर्सिटी और उसके अधिकारियों की नाक के नीचे यह खेल चलता रहा लेकिन किसी ने इस पर मुंह खोलने की जरूरत नहीं समझी। छात्रों की शिकायत के बाद हरकत में आए राजभवन ने तुरंत पत्राचार से एमफिल के खेल पर रोक लगा दी। अब फीस जमा करने वाले छात्र अपने पैसे वापस पाने के लिए धक्के खा रहे हैं। 
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