बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार भी मुकाबला राजग और महागठबंधन के बीच है। महागठबंधन पलायन, बेरोजगारी और एसआईआर में गड़बड़ी को मुद्दा बना रहा, जबकि राजग नीतीश सरकार की योजनाओं और नकद लाभ के भरोसे वोट साधने में जुटा है। सीएम महिला रोजगार योजना समेत कई योजनाओं के जरिए सरकार ने करोड़ों महिलाओं व गरीबों को आर्थिक लाभ पहुंचाया है।
बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। पिछले कई चुनावों की तरह इस बार भी मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और राजद की अगुवाई वाले विपक्षी महागठबंधन के बीच माना जा रहा। चुनाव तारीखों की घोषणा के साथ पक्ष-विपक्ष दोनों की राजनीतिक सरगर्मियां भी तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि इस बार सत्ता की जंग में पलायन, एसआईआर और नकद तोहफों की बारिश जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
राजग की ताकत
राज्य में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नीतीश कुमार की सुशासन वाली छवि, व्यक्तिगत स्तर पर कोई दाग नहीं n भाजपा और जदयू का संगठित कैडर आधार, जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे आरएसएस से जुड़े संगठनों का समर्थन भी शामिल है। n प्रधानमंत्री मोदी का सशक्त और स्वीकार्य चेहरा, चिराग पासवान का राजग से जुड़े रहना, उपेंद्र कुशवाहा की राजग में वापसी
कमजोरी
सीएम नीतीश के स्वास्थ्य को लेकर लगातार अटकलें जारी रहना और कई वर्षों से कुर्सी पर होने की वजह से सत्ता विरोधी लहर। n सरकार के कई मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, स्थानीय सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार के ममले सामने आना।
महागठबंधन की ताकत
राजद का मजबूत एमवाई जनाधार, जो कुल मतदाताओं का लगभग 30 प्रतिशत है, और युवाओं में सरकार के प्रति बढ़ती नाराजगी n राजद संस्थापक लालू यादव के पीछे हटने के बाद निर्विवाद नेता के तौर पर सामने आए उनके बेटे तेजस्वी यादव की युवाओं के बीच लोकप्रियता। n राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की मतदाता अधिकार यात्रा ने राज्य भर में पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश का नया संचार।
कमजोरी
काफी समय तक सत्ता से बाहर रहने के कारण पार्टी के भीतर महत्वाकांक्षी नेताओं को एकजुट रखना महागठबंधन के लिए एक प्रमुख चुनौती है। n नीतीश के कद के किसी परिपक्व नेता का अभाव, सीट बंटवारे पर अंदरूनी कलह, सीमांचल में ओवैसी का असर और लालू परिवार की दागदार छवि।