बिहार में नीतीश कुमार सरकार के खिलाफ सरकार विरोधी लहर है। भाजपा, संघ और लोजपा के कार्यकर्ता भी इसे स्वीकार कर रहे हैं। रालोसपा में उपेंद्र कुशवाहा के लेफ्टिनेंट का भी मानना है कि जद(यू) को तगड़ा झटका लग सकता है। लोगों में बाढ़, कोविड-19, मजदूरों के पलायन, प्रदेश सरकार के कामकाज समेत तमाम मामलों को लेकर काफी नाराजगी है। हम से चुनाव लड़ चुके सूत्र का कहना है कि लोजपा के नेता तो मौसम विज्ञानी माने जाते रहे हैं। उन्हें इसका आभास था। चिराग भी नीतीश कुमार सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी को समझ रहे हैं। इसलिए ही उन्होंने अलग चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। कुल मिलाकर इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को और इसके बाद राजद को हो सकता है। इस बार हम (मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के नेता जी फिर चुनाव मैदान में हैं।
भाजपा कार्यकर्ताओं को विश्वास है कि चुनाव में पार्टी अभूतपूर्व प्रदर्शन करने जा रही है। उसकी सीटें जद(यू) से दो गुनी हो सकती है। 2015 में राष्ट्रीय जनता दल को सबसे अधिक सीटें मिली थी। तब जद(यू) और कांग्रेस के साथ राजद चुनाव लड़ी थी। इस बार जद(यू) भाजपा के साथ है तो भाजपा ही सबसे बड़ी पार्टी बनने की ओर है। भाजपा के रणनीतिकार दूसरे नंबर पर राजद को स्थान दे रहे हैं। उन्हें तीसरे नंबर पर जद(यू) नजर आ रही है। रणनीतिकारों का अनुमान है कि इस चुनाव में लोजपा की सीटें पहले की तुलना में अच्छी आ सकती हैं। लोजपा, वीआईपी, रालोपा भाजपा के लिए सत्ता की सीढ़ी भी बन सकती है।
हालांकि पार्टी के नेताओं का कहना है कि भाजपा नीतीश कुमार को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगी। क्योंकि प्रधानमंत्री के सामने खड़े होने वाले देश के राजनीतिक नेताओं में नीतीश कुमार का चेहरा ही सबसे प्रभावी है। भाजपा के अंदरखाने में दो चर्चाएं हैं। पहली तो यह कि भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया है, लेकिन चुनाव बाद की स्थितियां इस घोषणा को प्रभावित कर सकती हैं। दूसरी चर्चा यह है कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री न बन पाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उन्हें केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने की पहल कर सकता है।
लोकतंत्र में चुनाव अनिश्चितताओं का उत्सव है। उत्सव के अंतिम परिणाम का केवल कयास लगाया जा सकता है। इसे हर पार्टी के कार्यकर्ता अपने हिसाब से आकलन करके लगाते और सपने देखते हैं। बीते चुनाव गवाह हैं कि कई बार ये सपने धरे के धरे रह जाते हैं। यह सही है कि बिहार में नीतीश कुमार के सरकार की चाहे जितनी आलोचना हो, लेकिन बिहार के आज भी वह नेता नंबर वन हैं। उनकी छवि की टक्कर का अब न तो विपक्ष के पास नेता है और न ही भाजपा के पास भी कोई चेहरा। भूलना नहीं चाहिए 2015 में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी सुशासन बाबू के चेहरे के आगे सफलता हासिल नहीं कर सका था।