चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनर्रीक्षण (एसआईआर) का काम पूरा करके राज्य की अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी है। जल्दी ही बिहार विधानसभा चुनावों की घोषणा हो जाएगी। संभावना है कि दीवाली और छठ के पर्व के बाद बिहार में मतदान होगा और नई विधानसभा का गठन होगा और नई सरकार बनेगी। बिहार के मतदाता नरेंद्र मोदी के चुनावी करिश्मे, राहुल गांधी के सामाजिक न्याय की राजनीति, तेजस्वी यादव के उभार नीतीश की रेवड़ियों और प्रशांतकिशोर द्वारा जगाई गई उम्मीद के बीच किसे चुनेंगे। इस यक्ष प्रश्न का उत्तर भी बिहार की जनता के ही पास है।
दोनों खेमे यानी एनडीए और महागठबंधन (इंडिया ब्लॉक) अपनी अपनी तैयारियों में जुट गए हैं। जहां मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए की जा रही चुनाव आयोग की कार्यवाही एसआईआऱ को मुद्दा बनाकर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने 16 दिन की वोट अधिकार यात्रा निकाल कर अपने दलों के कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बिहार में ताबड़तोड़ कार्यक्रमों के जरिए भाजपा ने लालू राज के जंगलराज, भ्रष्टाचार और अवैध घुसपैठ के मुद्दे को गरम करना शुरु कर दिया है। वोट अधिकार यात्रा के खत्म होते ही तेजस्वी यादव फिर बिहार के उन जिलों की यात्रा पर निकल गए जहां वह वोट अधिकार यात्रा में नहीं जा सके थे।कुल मिलाकर बिहार अब पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुका है।
लेकिन इस बार का चुनाव पिछली बार से कैसे अलग है और क्या मुद्दे होंगे जो इस चुनाव के नतीजों को तय करेंगे। मोटे तौर पर दोनों ही गठबंधनों में कमोबेश पहले जैसी ही स्थिति है। एनडीए में नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा जद(यू) प्रमुख घटक हैं और साथ में चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा के छोटे दल हैं। इसी तरह इंडिया महागठबंधन में राजद और कांग्रेस प्रमुख साझेदार हैं साथ ही वाम दल और मुकेश साहनी का वीआईपी दल भी है। हाल ही में चिराग के चाचा पशुपति पारस भी इसमें जुड़ गए हैं।लेकिन 2020 की तुलना में एनडीए की एकजुटता इस बार बेहतर है क्योंकि पिछले चुनाव में खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान ने अपने दल लोजपा(रा) के उम्मीदवार जद(यू) के उम्मीदवारों के खिलाफ ही चुनाव लड़े और नीतीश कुमार का जनता दल(यू) अब तक के अपने सबसे खराब प्रदर्शन 43 सीटों पर आ गया। राजद सबसे बड़ी पार्टी और सिर्फ एक सीट पीछे रहकर दूसरे नंबर की पार्टी बन गई। जो जद(यू) बिहार में एनडीए में बड़े भाई की भूमिका में हुआ करता था वो भाजपा की जूनियर साझेदार हो गया। हालांकि तय चुनावी वादे के मुताबिक मुख्यमंत्री पद तो नीतीश कुमार को मिला लेकिन उनकी स्थिति कमजोर हो गई। इसकी मुख्य वजह एनडीए के भीतर जद(यू) के कद को छांटने के लिए भाजपा का ऑपरेशन चिराग था और भाजपा उसमें कामयाब हुई।
लेकिन अब एनडीए में ऊपरी तौर पर एकजुटता दिख रही है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नीतीश कुमार, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी उपेंद्र कुशवाहा सब एक साथ हैं। चिराग तो लगातार घोषणा कर रहे हैं कि वह बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। इस पर जब विवाद शुरु हुआ तो उनकी तरफ से साफ किया गया कि उनका मतलब एनडीए के सभी उम्मीदवारों को अपने उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ाना है न कि उनकी पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। सीटों के बंटवारे का पेंच एनडीए में फंसा हुआ दिख रहा है क्योंकि चिराग पासवान चालीस सीटों पर लड़ने का दावा कर रहे हैं और जीतनराम मांझी भी 20 सीटों की मांग कर रहे हैं। जबकि उपेंद्र कुशवाहा की नजर भी कम से कम दस सीटों पर है, लेकिन वस्तुस्थिति इससे अलग यह है कि जद(यू) भाजपा से कम से कम एक सीट ज्यादा पर चुनाव लड़ना चाहता है और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इसे लेकर दोनों के बीच सहमति बन गई है। यानी 200 से 203 सीटें भाजपा जद(यू) के हिस्से में आएंगी और शेष चालीस सीटें अन्य सहयोगी दलों में बंटेगी।ऐसे में चिराग पासवान की चालीस और मांझी की बीस सीटों की मांग पूरी होना नामुमकिन है। फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का दबदबा भाजपा की संगठन शक्ति केंद्र सरकार का तंत्रबल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सेवाबल एनडीए की ताकत भी है और सीट बंटवारे को आसान बनाने के लिए काफी है।चुनाव जीतने के बाद क्या नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बनेंगे इसे लेकर भाजपा का जवाब गोलमोल है। गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि बिहार में एनडीए के नेता नीतीश कुमार हैं और उनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा। लेकिन चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का फैसला मिल बैठकर तय होगा।
अब बात इंडिया महागठबंधन की। राजद कांग्रेस वामदल और वीआईपी इस गठबंधन के प्रमुख घटक हैं। निर्विवाद रूप से इसके नेता राजद के तेजस्वी यादव ही हैं जिन्हें उनकी पार्टी ने भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश भी कर दिया है। 2020 में भी इस महागठबंधन में मुकेश साहनी की वीआईपी के सिवा बाकी सारे घटक दल शामिल थे। तब साहनी एनडीए के साथ थे, लेकिन लोकसभा चुनावों से वो राजद के साथ आ गए हैं। सामाजिक समीकरणों के लिहाज से इस गठबंधन के पक्ष में राजद का मूल वोट बैंक यादव और मुस्लिम लगभग एकजुट है। साथ ही इसमें वाम दलों और वीआईपी के जनाधार के जुड़ने से इसकी ताकत बढ़ जाती है। कांग्रेस की कोशिश जहां अल्पसंख्यक जनाधार को महागठबंधन के साथ एकजुट जोड़े रखने की है वहीं साथ ही उसकी नजर दलितों और अति पिछड़े वोटों पर भी है। दो बार के विधायक दलित नेता राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने दलितों खासकर रविदासी समुदाय को संदेश दिया है। रविदासी समाज कभी कांग्रेस का मजबूत जनाधार होता था जब जगजीवन राम केंद्र की राजनीति में सक्रिय थे, बाद में उनकी बेटी मीराकुमार ने इस विरासत को आगे बढ़ाया। उत्तर प्रदेश में बसपा के उभार के बाद इस समाज के बीच बसपा का प्रभाव काफी बढ़ गया था। लेकिन अब जब उत्तर प्रदेश में ही बसपा अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है तो बिहार के रविदासी समाज को नए नेतृत्व की तलाश है और कांग्रेस इसे अपने लिए एक सियासी अवसर मानकर इस समाज को अपने साथ जोड़ने में जुट गई है। इसके साथ ही नीतीश कुमार और जद(यू) के मूल ईबीसी (अति पिछड़े) जनाधार में भी सेंध लगाने की कांग्रेस की कोशिश है। इसके लिए राहुल गांधी और उनकी टीम ने लगातार बिहार में संविधान सम्मेलन और पिछड़ा सम्मेलन करके इस वर्ग को संदेश दिया है। राहुल गांधी का जातीय जनगणना का मुद्दा अब जबकि केंद्र सरकार ने मान लिया है तो उसके आगे हाल ही में पटना में कांग्रेस की अगुआई में महागठबंधन के नेताओं ने पिछडों और अति पिछड़ों के लिए विशेष घोषणा पत्र जारी करके अपनी मुहिम को नई धार दी है। इस विशेष घोषणा पत्र में उन मुद्दों को उठाया गया है जो अभी तक किसी भी दल के एजेंडे पर नहीं थे।
इसमें सबसे अहम पहली मांग है कि अति पिछड़ा अत्याचार निवारण अधिनियम बनाया जाए। यह अति पिछड़ों के संरक्षण का वैसा ही कानून होगा जैसा अनुसूचित जाति और अनुसूजित जनजाति के संरक्षण के लिए एससीएसटी एक्ट है। इस कानून के जरिए अति पिछड़ों को भी सवर्णों और दबंग पिछड़ी जातियों के अत्याचार और दमन से दलितों और आदिवासियों की तरह ही कानूनी संरक्षण देना है। क्योंकि अतिपिछड़ी जातियां हर बिरादरी के गावों में रहती हैं लेकिन उनकी तादाद गांव की प्रभावशाली जातियों की तुलना में खासी कम होती है और उनके साथ भी सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण दलितों की ही तरह होता है। सिर्फ उन्हें अछूत नहीं माना जाता, लेकिन बाहुबली वर्गों के दमन के प्रतिरोध का कोई कानून उनके पक्ष में न केंद्र सरकार ने और न ही किसी राज्य सरकार ने बनाया है।इसलिए यह घोषणा अति पिछड़ी जातियों को बिहार में महागठबंधन की तरफ मोड़ सकता है बर्शते कांग्रेस राजद और अन्य सहयोगी दल इसे अति पिछड़ों के बीच ज्यादा से ज्यादा पहुंचा सकें। इसके अलावा इस घोषणा पत्र में अति पिछड़ों के लिए पंचायतों और नगर निकायों में आरक्षण 20 से 30 फीसदी करने, सरकारी शिक्षण संस्थानों की ही तरह निजी शिक्षण संस्थानों में भी दलित आदिवासी, पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने,आबादी के अनुपात में आरक्षण सीमा 50 फीसदी से ज्यादा करने और पारित कानून को संविधान की नौंवी सूची में शामिल कराने, दलित पिछड़े अति पिछड़े और आदिवासी वर्गों के आवासीय भूमिहीनों को शहरी क्षेत्र में तीन और ग्रामीण क्षेत्र में पांच डेसिमल भूमि देने और 25 करोड़ रूपए तक के सरकारी ठेकों में अति पिछडा, अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ी जातियों के लिए 50 फीसदी आरक्षण जैसे कई लुभावने वादे शामिल हैं। वैसे तो यह बिहार चुनावों के लिए कांग्रेस विशेष रूप से राहुल गांधी की पहल पर महागठबंधन के लिए विशेष चुनाव घोषणा पत्र है लेकिन अगर बिहार में यह सफल हुआ तो कांग्रेस इसे पूरे देश में ले जाएगी। उसे उम्मीद है कि इसके जरिए वह उत्तर भारत के अन्य राज्यों में भी अपनी जमीन मजूबूत कर सकेगी।
बिहार में एसआईआर की कवायद पूरी हो चुकी है। चुनाव आयोग ने सात करोड़ चालीस लाख मतदाताओं की अंतिम सूची जारी कर दी है। हालांकि जिन पात्र लोगों के नाम इसमें नहीं आ पाए हैं वो नामांकन वापसी तक अपने नाम वैध दस्तावेज दिखाकर जुड़वा सकते हैं।यह एक तात्कालिक मुद्दा था जिसे लेकर राहुल गांधी तेजस्वी यादव ने 16 दिन की वोट अधिकार यात्रा निकालकर अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया और इस यात्रा के जरिए उन्होंने कथित वोट चोरी के अपने आरोप को गांव गांव चर्चा का विषय भी बना दिया, लेकिन यह मुद्दा चुनाव नतीजों को प्रभावित करेगा इसमें संदेह है। क्योंकि चुनाव के नतीजे बिहार के स्थानीय मुद्दे ही तय करेंगे। इनमें नीतीश सरकार की फटाफट घोषणाएं जिसमें सबसे अहम हर परिवार की एक महिला के खाते में दस हजार रुपए की राशि पहुंचाना भी शामिल है, को एनडीए गेम चेंजर मान रहा है। उसके नेताओं को उम्मीद है कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड की तरह बिहार में भी सत्ताधारी गठबंधन को महिलाओं के बीच इसका लाभ मिलेगा। जबकि महागठबंधन के लिए राज्य में बढ़ती बेरोजगारी, अन्य राज्यों में पलायन, खराब कानून व्यवस्था,शासन प्रशासन पर सरकारी का ढीला होता नियंत्रण जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। इन मुद्दों के बावजूद दोनों ही गठबंधनों के सामाजिक समीकरण किस तरह बनते हैं उनसे भी चुनाव नतीजे तय होंगे। एनडीए को अगर भाजपा के सवर्ण, जद(यू) के अति पिछडे, चिराग पासवान और जीतनराम मांझी के दलित जनाधार की एकजुटता का भरोसा है तो इंडिया महागठबंधन की राजद के यादव बहुल पिछड़े, मुस्लिम, कांग्रेस के अति पिछड़ों दलितों को लुभाने के प्रयासों, वाम मोर्चे और वीआईपी के अति पिछड़े और दलित जनाधार की मिलीजुली ताकत से एनडीए के मुकाबले की तैयारी है। जहां सवर्ण एनडीए और मुस्लिम यादव महागठबंधन के साथ एकजुट हैं तो चुनाव का सारा दारोमदार अति पिछड़ों और दलितों के रुझान से तय हो सकता है। इनका रुख जिधर जाएगा उसका पलड़ा भारी हो सकता है लेकिन अभी तक की खबरों के मुताबिक ये वर्ग एनडीए और महागठबंधन के बीच में बंट रहे हैं। ऐसे में नीतीश कुमार का महिला कार्ड बेहद अहम है। इसकी काट तेजस्वी और राहुल गांधी के पास क्या है।
इस बार बिहार चुनाव में एक नया लेकिन प्रभावशाली फैक्टर प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी का मैदान में होना है। पिछले दो साल से भी कुछ ज्यादा वक्त से प्रशांत किशोर बिहार में राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं। चुनाव प्रबंधन का काम छोड़ने और कांग्रेस से बात बिगड़ने के बाद पीके ने बिहार को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और पदयात्रा के जरिए पूरा बिहार उन्होंने नापा। फिर जनसुराज के नाम से नया दल बनाया और लगातार अपनी पार्टी के विस्तार और विकास में वह सक्रिय हैं। बिहार के पिछड़ेपन, पलायन, बेरोजगारी, अपराध जैसे मुद्दों पर वह राजद भाजपा जद(यू) तीनों को घेरते रहे हैं। उन्होने पिछले 35 वर्षों से बिहार की राजनीतिक जड़ता पर प्रहार करते हुए लोगों को नई उम्मीद जगाने का काम किया है। हालांकि घनघोर जातीय गोलबंदी वाले राज्य बिहार में प्रशांत किशोर के पास वैसा सामाजिक (जातीय) जनाधार नहीं है जैसा कि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के पास रहा है और पीके जिस सवर्ण(ब्राह्ण) समाज से हैं वो भाजपा के साथ एकजुट है, लेकिन इसके बावजूद पीके ने बिहार के नौजवानों और उन मतदाताओं जो नीतीश कुमार से भर पाए हैं और लालू परिवार के साथ जाना नहीं चाहते हैं उन्हें एक नया विकल्प दिया है। इस मतदाता समूह में सभी जातियों और वर्गों के लोग हैं। इनमें ज्यादातर युवा और महिलाओं की तादाद है।अब सवाल है कि प्रशांत किशोर की पार्टी के मैदान में होने से किस खेमे पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसका अंदाजा अभी चुनाव विश्लेषण और सर्वेक्षक भी नहीं लगा पा रहे हैं। लेकिन पीके को अनदेखा या खारिज बिल्कुल भी नहीं किया जा सकता। हालांकि खुद प्रशांत किशोर को यकीन है कि इस बार बिहार नया इतिहास बनाएगा और नतीजे सबको चौंका देंगे। जनसुराज सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और अभी तक किसी भी अन्य दल से उसके गठबंधन की कोई खबर नहीं है। वैसे बहुजन समाज पार्टी और असउद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी हर बार की तरह मैदान में हैं। बसपा उत्तर प्रदेश सटे भोजपुर रोहतास बक्सर जैसे जिलों में अपने उम्मीदवार उतारेगी जबकि ओवैसी 24 विधानसभा सीटों वाले मुस्लिम बहुल सीमांचल में खम ठोकेंगे। इन दोनों से जो भी नुकसान होगा महागठबंधन को ही हो सकता है और उसकी रोकथाम के लिए महागठबंधन के पास अच्छे उम्मीदवार उतारना ही एक बेहतर रणनीति हो सकती है। कुल मिलाकर बिहार में मतदाताओं को एसआईआर भ्रष्टाचार वोटचोरी की ललकार, जन सुराज की हुंकार और सरकारी खजाने की बौछार के बीच अगले पांच साल के लिए अपने राज्य का भविष्य तय करना है।