नीतीश कुमार-चिराग पासवान-जीतन राम मांझी-तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)
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बिहार विधानसभा चुनाव में गठबंधन की तस्वीर करीब-करीब साफ हो गई है। रालोसपा हम वीआईपी और लोजपा को अपने अपने पुराने गठबंधन में जगह नहीं मिली। जीतनराम मांझी की हम ने पाला बदलकर राजग का दामन थामा है तो लोजपा ने जदयू के खिलाफ खड़े होने की घोषणा कर दी। दरअसल इन दलों के पिछले प्रदर्शन और हैसियत से बड़ी मांग के कारण गठबंधन के नेतृत्व करने वाले दलों से तालमेल नहीं बैठ पाया।
पहले महागठबंधन में शामिल जीतनराम मांझी, वीआईपी के मुकेश सहनी, उपेंद्र कुशवाहा ने केवल ज्यादा सीटें चाहते थे बल्कि खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी बनाना चाहते थे। इस तरह लोजपा अध्यक्ष भी कई मांगों के साथ खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की मांग कर रहे थे। वहीं जन अधिकार पार्टी के मुखिया पप्पू यादव महागठबंधन से 50 सीटों के साथ मुख्यमंत्री पद देने की मांग कर रहे थे।
राजद ने इसलिए बनाई छोटे दलों से दूरी
इन दलों की मांगों से राजद की रणनीति गड़बड़ा रही थी। पिछले चुनावों में भी रालोसपा, वीआईपी, हम, जपा का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा था। मसलन बीते लोकसभा चुनाव में चार वीआईपी और हम तीन-तीन सीटों पर चुनाव लड़ी थी और तीनों दलों का कुल वोट महज एक फीसदी था। रालोसपा तीन सीटें करीब तीन लाख मतों के अंतर से तो खुद कुशवाहा करीब एक लाख मतों से चुनाव हारे थे जबकि वीआईपी 2 सीटें चार लाख वोटों से हारी थी। हम को भी तीन सीटों पर करारी हार मिली थी।
वाम दलों, कांग्रेस को इसलिए महत्व
राजद की रणनीति कांग्रेस के सहारे आंकड़े और वामदलों के परंपरागत मतों को हासिल करने की है। पिछले चुनाव में वाम मोर्चा को 6 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के सहारे पार्टी को आंकड़ों के साथ दलित वोट में भी सेंधमारी की उम्मीद है।
चिराग कुशवाहा को ना, मांझी को हां
राजग में लोजपा व रालोसपा पर अंतिम समय में सहमति नहीं बन पाई जबकि मांझी को जगह मिल गई। मांझी महागठबंधन में बेशक फिट नहीं बैठ रहे थे, लेकिन राजग में महादलित वोटरों को पक्ष में करने और लोजपा की कमी पूरी करने के लिए वह फिट थे। मांझी की मांग भी ज्यादा बड़ी नहीं थी। दूसरी ओर आरएलएसपी जो कुशवाहा जाति को अपना आधार बताती है, उसमें नीतीश के कारण जदयू की व्यापक पकड़ है। अब कुशवाहा बसपा के साथ गठजोड़ कर मैदान में हैं।