बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। तारीखों के एलान से पहले ही सियासी पारा चढ़ चुका है। चुनाव आयोग और राज्य के विपक्षी दलों के बीच तकरार जारी है। इस चुनावी मौसम में अमर उजाला अलग-अलग सीरीज के जरिए बिहार की सियासत के बारे में बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज में आज हम सहरसा विधानसभा सीट की बात करेंगे।
पहले जानते हैं सहरसा सीट के बारे में
बिहार के 38 जिलों में से एक सहरसा जिला भी है। सहरसा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र मधेपुरा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें हैं। इनमें आलमनगर, बिहारीगंज, मधेपुरा, सोनबरसा (एससी), सहरसा और महिषी शामिल हैं। सहरसा विधानसभा सीट पर 1957 में सबसे पहले चुनाव हुए थे।
1957 में पहली बार हुए चुनाव
1957 में सहरसा सीट पर सबसे पहले चुनाव हुए थे। उस चुनाव में यहां से कांग्रेस को जीत मिली थी। कांग्रेस के विश्वेश्वरी देवी ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रमेश झा को 378 वोट से हरा दिया था।
इसके बाद 1962 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की विश्वेश्वरी देवी को हार का सामना करना पड़ा था। इस चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रमेश झा ने विश्वेश्वरी देवी को 19,524 वोट से हरा दिया था।
टिकट पर जीते रमेश झा
1962 के बाद रमेश झा की जीत का सिलसिला शुरु हो गया। 1957 में उन्हें पीएसपी से हार मिला और 1962 में पीएसपी से जीत मिली। इसके बार रमेश झा ने पार्टी बदल ली और कांग्रेस में शामिल हो गए। 1967 का चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और जीते। कांग्रेस के रमेश झा ने बीजेएस के सी. झा को 4,200 वोट से हरा दिया था।
1969 में एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर रमेश झा ने शोषित दल के सुरेश चंद्र यादव को 340 वोट से हरा दिया था। 1972 में रमेश झा ने जीत का चौका लगाया। इस बार भी उन्होंने सुरेश चंद्र को हराया। इस बार सुरेश चंद्र ने पार्टी बदल ली थी और कांग्रेस ऑर्गेनाइजेशन से चुनाव लड़ा था। कांग्रेस के रमेश झा ने कांग्रेस ऑर्गेनाइजेशन के सुरेश चंद्र यादव को 1,939 वोट से हरा दिया था।
1977: जनता लहर में हारे रमेश
1977 की जनता लहर में रमेश झा की जीत का सिलसिला टूट गया और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस के रमेश झा को जनता पार्टी के शंकर प्रसाद टेकरीवाल ने 8,951 वोट से हरा दिया था। टेकरीवाल आगे चलकर बिहार सरकार में मंत्री बने। राबड़ी देवी सरकार के दौर में टेकरीवाल ने पास वित्त और परिवहन जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली।
1980: एक बार फिर जीते रमेश झा
1980 में रमेश झा को सहरसा विधानसभा सीट पर पांचवीं जीत मिली। कांग्रेस (आई) से चुनाव लड़े रमेश झा ने माकपा के जनार्दन पांडे को 53,555 वोट से हरा दिया। भाजपा के शंकर प्रसाद टेकरीवाल तीसरे स्थान पर रहे थे।
1985: सतीश चंद्र झा को मिली जीत
1985 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से कांग्रेस को जीत मिली। कांग्रेस के सतीश चंद्र झा ने लोकदल के शंकर टेकरीवाल को 8,182 वोट से हरा दिया।
शंकर प्रसाद टेकरीवाल ने लगाई हैट्रिक
1990 में शंकर प्रसाद टेकरीवाल ने 13 साल बाद एक बार फिर से जीत दर्ज की। इससे पहले 1977 के चुनाव में जनता पार्टी से जीत दर्ज की थी। 1990 में उन्हें फिर से बार जीत मिली और इसके बाद वह लगातार तीन बार जीते। 1990 में जनता दल के टेकरीवाल ने कांग्रेस के सतीश चंद्र झा को 30,945 वोट से हरा दिया था।
1995 में एक बार फिर जनता दल के शंकर प्रसाद टेकरीवाल ने कांग्रेस के सतीश चंद्र झा को 26,950 वोट से हरा दिया था। 2000 में एक बार फिर राजद के शंकर प्रसाद टेकरीवाल ने जीत दर्ज की। उन्होंने बीपीएसपी उम्मीदवार और बाहुबली आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को 14,077 वोट से हरा दिया था।
2005: भाजपा को मिली पहली जीत
2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। दोनों ही चुनाव में सहरसा सीट पर भाजपा के संजीव कुमार झा को जीत मिली थी। 2005 में पहली बार फरवरी में चुनाव हुए थे। इसमें भाजपा को पहली बार सहरसा सीट पर जीत मिली। भाजपा के संजीव कुमार झा ने राजद के सूर्य नारायण यादव को 9,406 वोट से हरा दिया। वहीं, दूसरे चुनाव अक्तूबर में हुए थे। इस चुनाव में भाजपा के संजीव कुमार झा ने राजद के डाॅ. अब्दुल गफूर को 6,159 वोट से हरा दिया था।
2010: आलोक रंजन झा को जीत
2010 में फिर से भाजपा को जीत मिली। इस बार संजीव कुमार झा को भाजपा की तरफ से टिकट नहीं मिला। भाजपा ने इस बार आलोक रंजन को मैदान में उतारा। रंजन ने राजद के अरुण कुमार को 7,979 वोट से हरा दिया था।
2015: पलटे नतीजे
2015 में एक बार फिर से मुकाबला आलोक रंजन और अरुण कुमार में बीच में था, लेकिन इस बार जीत राजद के अरुण कुमार को मिली। उन्होंने भाजपा के आलोक रंजन को 39,206 वोट से हरा दिया था।