बिहार विधानसभा चुनाव चंद महीने दूर हैं। सियासी बिसात पर शह-मात का खेल भी शुरू हो चुका है। इस चुनावी साल में अमर उजाला अलग-अलग सीरीज के जरिए बिहार की सियासत के बारे में बता रहे हैं। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज में आज हम नरकटियागंज विधानसभा सीट की बात करेंगे।
पहले जानते हैं नरकटियागंज सीट के बारे में
बिहार के 38 जिलों में से एक पश्चिमी चंपारण जिला भी है। नरकटियागंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र वाल्मीकि नगर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। वाल्मीकि नगर लोकसभा में कुल छह विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें वाल्मीकि नगर, रामनगर (एससी), नरकटियागंज, बगहा, लौरिया, सिकटा शामिल हैं। इस सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस ने राज किया है। नरकटियागंज सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी। इससे पहले यह सीट मौजूद नहीं थी। 2010 में इस सीट पर पहली बार चुनाव हुए थे। यह सीट पहले शिकारपुर के नाम से जानी जाती थी।
2010 में पहली बार हुए चुनाव
इस सीट पर 2010 में पहली बार चुनाव हुए थे। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच मे हुआ था। भाजपा के सतीश चंद्र दुबे ने कांग्रेस के आलोक प्रसाद वर्मा को 20228 वोट से हरा दिया था। तीसरे नंबर पर फखरुद्दीन खान रहे थे। इन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर 22381 वोट मिले थे।
सतीश चंद्र दुबे बिहार के बड़े नेता है। वह बिहार से राज्यसभा पहुंचे और उन्हें भारत सरकार में कोयला एवं खनन राज्य मंत्री हैं। 2014 में वह भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। सतीश चंद्र के लोकसभा पहुंचने के बाद यह सीट खाली हो गई थी। इसके बाद सीट पर 2014 में उपचुनाव कराए गए थे।
2014 में हुए उपचुनाव
सतीश चंद्र दुबे के लोकसभा पहुंचने के बाद सीट पर उपचुनाव हुए। इस सीट पर भाजपा की रश्मि वर्मा को जीत मिली थी। भाजपा की रश्मि वर्मा ने कांग्रेस के फखरुद्दीन खान को 15742 वोट से हरा दिया था। रश्मि वर्मा की यह सीट पहली जीत थी।
रश्मि वर्मा बिहार की राजनीति में काफी सुर्खियों में रहती है। इनका परिवार 1957 से बिहार की राजनीति में सक्रिय है। रश्मि वर्मा के पति आलोक प्रसाद वर्मा ने 2010 में कांग्रेस के टिकट पर इस सीट से हार का सामना किया था। आलोक प्रसाद वर्मा के पूर्वज चंपारण के रामनगर के दीवान थे।
2015 में विनय वर्मा को मिली जीता
2015 में भी वर्मा परिवार को इस सीट से जीत मिली थी। कांग्रेस के टिकट पर विनय वर्मा ने भाजपा के की रेनू देवी को हरा दिया था। विनय वर्मा आलोक वर्मा के चचेरे भाई हैं। रेनू देवी को विनय वर्मा ने 16061 वोट से हरा दिया था। खास बात यह है कि वर्मा घराने के दो लोग एक ही सीट से अलग अलग दल से चुनाव लड़ रहे थे। 2015 में भाजपा ने रश्मि वर्मा को टिकट नहीं दिया था। जिसकी वजह से वह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही थी। रश्मि वर्मा अपने चचेरे जेठ के खुलाफ ही इस बार चुनावी मैदान में थी। उन्होंने भाजपा के वोट काटने का काम किया था। उन्हें तीसरे नंबर पर 39200 वोट मिले थे।
2020 में भाभी और जेठ में टक्कर
2020 में रश्मि वर्मा और उनके जेठ विनय वर्मा के बीच मुकाबला देखने को मिला। रश्मि वर्मा को भाजपा ने टिकट दिया था वहीं विनय वर्मा को कांग्रेस को टिकट मिला था। रश्मि वर्मा ने विनय वर्मा को 21134 वोट से हरा दिया था।
रश्मि वर्मा कई बार अलग अलग कारणों से सुर्खियों में रह चुकी है। 2023 में उनकी कुछ आपत्तिजनक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। फोटो में वह अपने साथ काम करने वाले संजय सारंगपुरी के साथ नजर आ रही थी। जिसके बाद उन्होंने इस फोटो को एडिट और भ्रामक बताया था। इसके बाद उन्होंने मोतिहारी नगर थाना में दो करोड़ के रंगदारी के लिए अपहरण का मामला दर्ज कराया है, वहीं रश्मि वर्मा समेत चार लोगों पर भी आर्म्स एक्ट सहित कई संगीन धाराओं में केस दर्ज किया गया था।
2022 में उनके पद से इस्तीफे की खबरों ने भी काफी जोर पकड़ा था। हालांकि मामले को बाद में पारिवारिक बताकर खत्म किया गया। कहा जा रहा था कि उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (यूपीटीइटी) पेपर लीक मामले में भाई का नाम आने के बाद रश्मि वर्मा यह कदम उठाने जा रही थी।
दीवान राजघराना
वर्मा राजघराने में विनय वर्मा के पिता सिंहेश्वर प्रसाद वर्मा 1957 में शिकारपुर विधानसभा से चुनाव जीते थे। उमेश प्रसाद वर्मा जो की उसी राजघराने से संबंध रखते थे वह 1962 में यहां से चुनाव जीते थे। इस घराने से विपिन बिहारी वर्मा 1950-52 में पहली लोकसभा में सदस्य के रूप में लोकसभा पहुंचे थे।