कोरोना महामारी से निपटने के लिए कारगर मानी जा रही प्लाज्मा थैरेपी को लेकर देश के कुछ चिकित्सकों और वैज्ञानिकों ने आगाह किया है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 रोगियों के इलाज में स्वस्थ हो चुके लोगों के प्लाज्मा के 'अतार्किक तथा गैर-वैज्ञानिक इस्तेमाल' को खतरनाक बताया है। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे कोरोना वायरस के और खतरनाक स्वरूप पैदा होने की आशंका है।
विजयराघवन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग
डॉ. कांग व डॉ. प्रमेश सीएस ने मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार विजयराघवन से आग्रह किया कि वे इस मामले में तत्काल दखल दें और कोविड-19 मरीजों, कोरोना से उबर चुके लोगों व उनके परिवारों की प्रताड़ना रोकें।
पत्र में कहा गया है कि पिछले माह केंद्रीय स्वास्थ मंत्रालय ने वयस्क कोरोना मरीजों के इलाज को लेकर नई गाइडलाइन जारी की थी। इसमें कोरोना के मध्यम लक्षण दिखाई देने के दौरान ही प्लाज्मा थैरेपी को कारगर बताया था। सात दिन बाद इसके इस्तेमाल का कोई औचित्य नहीं है। जबकि देशभर के अस्पतालों में इसका धडल्ले से उपयोग हो रहा है।
प्लाज्मा के लिए भटक रहे लोग
डॉ. कांग व डॉ. प्रमेश ने अपने पत्र में कहा है कि कोरोना मरीजों के परिजन प्लाज्मा पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। उनकी पीड़ा को समझा जा सकता है, क्योंकि वे अपने प्रियजन को बचाने के लिए हरसंभव उपाय करना चाहते हैं और डॉक्टर इसके इस्तेमाल की सिफारिश कर रहे हैं।
गंभीर मरीजों के इलाज व मौतें कम करने में कारगर नहीं
यह पाया गया कि प्लाज्मा थैरेपी गंभीर कोरोना मरीजों के इलाज या मौत का खतरा कम करने में कारगर नहीं है। प्लाज्मा थैरेपी में कोरोना से उबर चुके व्यक्ति के रक्त से एंटीबॉडी निकाली जाती है और उसे संक्रमित व्यक्ति को दिया जाता है। पत्र में कहा गया है कि आईसीएमआर ने देश के 39 अस्पतालों में इसका पहला परीक्षण किया था। इसमें पाया गया कि कोरोना के गंभीर मरीजों या मौत के खतरे में इससे कोई असर नहीं पड़ा। इसके बाद 11,588 मरीजों पर इसका अध्ययन किया गया। इसमें भी मौतों में कमी या अस्पताल से जल्दी छुट्टी होने जैसी स्थिति नहीं बनी।