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सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय को लेकर हो सकता है 14 अक्टूबर को बड़ा ऐलान

Thu, 04 Oct 2018 06:11 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
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सार्वजनिक क्षेत्र के तीन बैंक, विजया, देना और बैंक अॉफ बड़ौदा के विलय के खिलाफ 14 अक्तूबर को बैंक अधिकारी एवं कर्मचारी एसोसिएशनों द्वारा बड़ा ऐलान संभव है। 

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इसमें आॅल इंडिया बैंक अधिकारियों के चार और कर्मचारियों के पांच संगठन शामिल हैं। विलय के खिलाफ ये सभी संगठन कलम छोड़ हड़ताल जैसा कठोर फैसला ले सकते हैं।

खास बात है कि इस मुहिम में पहली बार किसान, छात्र, श्रमिक, गैर-सरकारी संगठन और राजनीतिक दलों को साथ लेने की कोशिश हो रही है। इस बाबत आॅल इंडिया बैंक ऑफ़िसर्स कॉनफ़ेडरेशन (एआईबीओसी) व कर्मचारी संगठनों की 14 अक्टूबर को मुंबई में बैठक होगी।
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कॉनफ़ेडरेशन के राष्ट्रीय महासचिव सौम्या दत्ता का कहना है कि केंद्र सरकार अपनी कमियों को छिपाने के लिए बैंकों पर जबरन विलय प्रक्रिया थोप रही है। जो बैंक लाभ में हैं, सरकार उन्हें भी विलय की सूची में डाल रही है।

बैंकों के विलय से पहले जो कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी पडती है, सरकार उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि विलय प्रक्रिया में बैंकिंग कंपनियों के अधिग्रहण और हस्तांतरण अधिनियम, 1970/1980 के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन किया गया है। 

नियम कहता है कि सरकार को संसद के दोनों सदनों के सम्मुख विलय का प्रस्ताव पेश करना चाहिए था। इसके अलावा, विलय की मंज़ूरी से पहले सार्वजनिक बैंकों के बोर्डों में कार्यकर्ताओं / अधिकारियों की सहमति लेनी भी ज़रूरी होती है।

एआईबीओसी के पदाधिकारियों का दावा है कि विलय के लिए ये तीनों बैंक सरकारी योजनाएं, जैसे छोटे और सीमांत किसान, छोटे व्यवसायी, छात्रों और महिलाओं के लिए बनी योजनाओं पर अच्छे तरीके से काम कर रहे थे। 

सामाजिक क्षेत्र की योजनाएं, सामुदायिक सेवा, क्रेडिट, इनमें तीनों बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनके विलय से स्थानीय ग्राहकों के मनोबल और उनकी भावना को निश्चित रूप से नुकसान पहुंचेगा। 
 

विलय का सफलता प्रतिशत अच्छा नहीं है...

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एआईबीओसी के मुताबिक, इतिहास गवाह है कि बैंकों की विलय प्रक्रिया अधिक सफल नहीं कही जा सकती। हाल ही में हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू अध्ययन में यह सामने आया है कि विलय की विफलता दर 70 से 90 प्रतिशत के बीच रहती है।

भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जहां बैंकों के विलय, उनकी कामकाजी प्रणालियों, पद्धति के बेजोड़ समेकन, संगठन पुनर्गठन के ग़लत तरीक़ों, अनुचित और जल्दबाजी संचार व अव्यवहारिकता पूर्ण मानव संसाधन एकीकरण के असफल रहे हैं।

साथ ही पूर्व विलय के दौरान जोखिम, तालमेल की कमी, अजीब प्रबंधकीय निर्णय और सांस्कृतिक विचारों की कमी भी विलय प्रक्रिया को फ़ेल कर देती है। साल 1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया के विलय से बाहर होने के कारण, पीएनबी ने अपना पहला नुकसान देखा था। 

एसोसिएट बैंकों के विलय के बाद, वित्त वर्ष 2017-18 में एसबीआई को अभूतपूर्व भारी नुकसान हुआ, जो वित्त वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही तक जारी रहा है। एनपीए के संचय ने बैंक के एनपीए स्तर को उच्चतम स्थिति में ट्रिगर किया है। नतीजा, 600 शाखाओं और 122 नियंत्रण कार्यालयों को बंद करना पड़ा।

 
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अमेरिका में पांच हजार बैंक संचालित हैं, जबकि भारत में हैं मात्र 86 

उपलब्ध तथ्यों और आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं कि भारतीय बैंक शाखाओं का अनुपात दुनिया की अन्य विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी कम है। सौम्या का कहना है कि भारत सरकार यह राग अलापती है कि अर्थव्यवस्था और बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने के लिए, बैंकों की संख्या का आकार घटाया जाना चाहिए, लेकिन यह पूरी तरह भ्रामक है। 

संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 5000 बैंक संचालित हैं, जर्मनी में 2000, ब्रिटेन में 300 बैंक हैं, जबकि भारत में केवल 86 बैंक हैं, जिनमें से केवल 21 बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के हैं। हमारे देश में न तो आरबीआई और न ही सरकारें, उन बड़े कॉर्पोरेट्स के खिलाफ कुछ कर पा रही हैं, जिन्होंने बैंकों को एनपीए के नीचे ला दिया। हैरानी की बात तो यह है कि आरबीआई ने विलुप्त डिफॉल्टर्स की सूची तक जारी नहीं की है। 

पिछले साल पांच बैंकों का विलय हुआ था.....

भारतीय स्टेट बैंक के पांच सहयोगी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर (एसबीबीजे), स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद (एसबीएच) स्टेट बैंक ऑफ मैसूर (एसबीएम), स्टेट बैंक ऑफ पटियाला (एसबीपी) और स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर (एसबीटी) के साथ-साथ भारतीय महिला बैंक (बीएमबी) का एक अप्रैल 2017 से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में विलय हो गया था। इससे स्टेट बैंक के कर्मचारियों की कुल संख्या 2,70,011 तक पहुंच गई है। इसमें 69,191 कर्मचारी सहयोगी बैंकों और बीएमबी के हैं।
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