सार्वजनिक क्षेत्र के तीन बैंक, विजया, देना और बैंक अॉफ बड़ौदा के विलय के खिलाफ 14 अक्तूबर को बैंक अधिकारी एवं कर्मचारी एसोसिएशनों द्वारा बड़ा ऐलान संभव है।
इसमें आॅल इंडिया बैंक अधिकारियों के चार और कर्मचारियों के पांच संगठन शामिल हैं। विलय के खिलाफ ये सभी संगठन कलम छोड़ हड़ताल जैसा कठोर फैसला ले सकते हैं।
खास बात है कि इस मुहिम में पहली बार किसान, छात्र, श्रमिक, गैर-सरकारी संगठन और राजनीतिक दलों को साथ लेने की कोशिश हो रही है। इस बाबत आॅल इंडिया बैंक ऑफ़िसर्स कॉनफ़ेडरेशन (एआईबीओसी) व कर्मचारी संगठनों की 14 अक्टूबर को मुंबई में बैठक होगी।
कॉनफ़ेडरेशन के राष्ट्रीय महासचिव सौम्या दत्ता का कहना है कि केंद्र सरकार अपनी कमियों को छिपाने के लिए बैंकों पर जबरन विलय प्रक्रिया थोप रही है। जो बैंक लाभ में हैं, सरकार उन्हें भी विलय की सूची में डाल रही है।
बैंकों के विलय से पहले जो कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी पडती है, सरकार उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि विलय प्रक्रिया में बैंकिंग कंपनियों के अधिग्रहण और हस्तांतरण अधिनियम, 1970/1980 के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन किया गया है।
नियम कहता है कि सरकार को संसद के दोनों सदनों के सम्मुख विलय का प्रस्ताव पेश करना चाहिए था। इसके अलावा, विलय की मंज़ूरी से पहले सार्वजनिक बैंकों के बोर्डों में कार्यकर्ताओं / अधिकारियों की सहमति लेनी भी ज़रूरी होती है।
एआईबीओसी के पदाधिकारियों का दावा है कि विलय के लिए ये तीनों बैंक सरकारी योजनाएं, जैसे छोटे और सीमांत किसान, छोटे व्यवसायी, छात्रों और महिलाओं के लिए बनी योजनाओं पर अच्छे तरीके से काम कर रहे थे।
सामाजिक क्षेत्र की योजनाएं, सामुदायिक सेवा, क्रेडिट, इनमें तीनों बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनके विलय से स्थानीय ग्राहकों के मनोबल और उनकी भावना को निश्चित रूप से नुकसान पहुंचेगा।