भूटान में तेजी से बन रही हिमनद झीलें जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर खतरे के रूप में उभर रही हैं। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में आधुनिक मॉडलिंग तकनीकों के जरिए संभावित ग्लेशियर झील विस्फोट (जीएलओएफ) और उससे प्रभावित होने वाले क्षेत्रों का आकलन किया गया है। शोध के अनुसार, संभावित बाढ़ से 11,000 से अधिक लोगों के साथ हजारों इमारतें, सैकड़ों किलोमीटर सड़कें, कृषि भूमि और अनेक पुल प्रभावित हो सकते हैं।
हिमालय में जलवायु परिवर्तन का असर अब सिर्फ तेजी से पिघलते ग्लेशियरों तक सीमित नहीं रह गया है।वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्लेशियरों के पिघलने से बन रही हिमनद झीलें (ग्लेशियल लेक) भूटान में बड़े जलवायु खतरे का रूप लेती जा रही हैं। यदि इनमें से कोई झील फटती है तो उसके कारण आने वाली बाढ़ हजारों लोगों की जिंदगी, घर, खेती, सड़कें और पुलों को चंद घंटों में तबाह कर सकती है।
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नई रिसर्च में पहली बार आधुनिक मॉडलिंग तकनीक के जरिए यह भी पता लगाया गया है कि कौन-सी झीलें सबसे अधिक जोखिम वाली हैं और उनके फटने पर किन आबादी वाले इलाकों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। ब्रिटेन के न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचुरल हैजर्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन में ज्यूरिख यूनिवर्सिटी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तथा नेपाल स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के वैज्ञानिक भी शामिल रहे। यह ऐसा पहला अध्ययन है जिसमें पहली बार लोगों को होने वाले संभावित नुकसान के साथ बुनियादी ढांचे के जोखिम का भी आकलन किया गया है। अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने केवल हिमनद झीलों की स्थिति का विश्लेषण नहीं किया, बल्कि यह भी आकलन किया कि यदि किसी झील का बांध टूटता है तो बाढ़ का पानी किन गांवों, आबादी वाले क्षेत्रों और बुनियादी ढांचे तक पहुंचेगा।
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तबाही की आशंका
अध्ययन के अनुसार संभावित बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 11,000 से अधिक लोग रहते हैं। इसके अलावा 2,500 से ज्यादा इमारतें, 250 किलोमीटर से अधिक सड़कें, लगभग 20 वर्ग किलोमीटर कृषि भूमि और 400 से अधिक पुल खतरे के दायरे में हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी स्थिति में नुकसान केवल संपत्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवहन, कृषि, आजीविका और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।