भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी कार्यकर्ता गौतम नवलखा की याचिका पर शुक्रवार को बंबई उच्च न्यायालय ने सुनवाई की। अदालत ने नवलखा के आवेदन पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। उन्होंने अदालत से पुणे पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की है।
25 जुलाई को पुणे पुलिस ने बंबई उच्च न्यायालय में दावा किया था कि गौतम आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिद्दीन से संपर्क थे। पुलिस के मुताबिक नक्सली समूह भी हिज्बुल और कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से संपर्क में थे।
न्यायमूर्ति रंजीत मोरे और जस्टिस भारती डोंगरे की बेंच ने हालांकि नवलखा की गिरफ्तारी पर लगी रोक अगले आदेश तक बढ़ा दी थी। पांच जुलाई को उच्च न्यायालय ने नवलखा की गिरफ्तारी पर 23 जुलाई तक अंतरिम रोक लगाई थी।
नवलखा और कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ता नक्सलियों से कथित संबंधों के आरोप में मुकदमे का सामना कर रहे हैं। नवलखा ने उच्च न्यायालय से अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर खारिज करने की गुहार लगाई थी, जिस पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया है।
पुणे पुलिस की ओर से पेश अधिवक्ता अरुणा पाई ने हाईकोर्ट में कहा था कि मामले में सह-आरोपी रौना विल्सन और सुरेंद्र गाडलिंग के लैपटॉप से बरामद जानकारी से साबित होता है कि नवलखा और उससे जुड़े विभिन्न नक्सल समूहों ने हिज्बुल के शीर्ष नेताओं से बातचीत की थी।
नवलखा 2011 से हिज्बुल समेत विभिन्न प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से संबंध बनाने में जुटे हैं। नवलखा का संपर्क 2011 से 2014 के बीच सैयद अली शाह गिलानी और शकील बख्शी समेत विभिन्न कश्मीरी अलगाववादी नेताओं से भी रहा। हालांकि नवलखा के वकील ने सभी आरोपों को निराधार करार दिया।