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TDP को सियासी सबक सिखाने के मूड में भाजपा, शाह ने राम माधव को सौंपा आंध्र फतह का जिम्मा

Mon, 19 Mar 2018 10:33 PM IST
संजय मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सरकार के लिए सियासी संकट पैदा कर रही पूर्व सहयोगी एवं आंध्र प्रदेश की राजनीतिक पार्टी टीडीपी को भाजपा सबक सिखाने के मूड में है। यही वजह है कि संसद में सरकार के पास प्रचंड बहुमत होने के बावजूद सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा नहीं करा रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की मानें तो टीडीपी को वह सबक सिखाने के मूड में हैं।

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 इस बीच भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपने सबसे लक्की महासचिव राम माधव को आंध्र प्रदेश में कमल खिलाने की जिम्मा सौंपते हुए उन्हें सूबे के चुनावी मोर्चे पर उतार दिया है। अपने रणनीतिक कौशल के जरिए भाजपा के लिए सबसे कठीन माने-जाने वाले राज्यों जम्मू-कश्मीर, असम, त्रिपुरा और नागालैंड में पार्टी को चुनाव जीतवाकर सरकार बनवाने वाले माधव अब आंध्र प्रदेश में भाजपा को सफलता दिलवाएंगे। 

हालांकि माधव को आंध्र प्रदेश के कामकाज से जोड़ने का अभी औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है। मगर सूत्र बताते हैं कि शनिवार को राज्य भाजपा नेताओं संग बैठक के बाद शाह ने इस आशय का निर्णय ले लिया है। प्रदेश के नेताओं को इस बात की जानकारी दे दी गई है। माधव के जिम्मे जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों के अलावा अब आंध्र प्रदेश भी होगा। 

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नायडू के खिलाफ क्यों टेढ़ी हुई हैं भाजपा की नजरें

दरअसल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उनकी पार्टी टीडीपी के खिलाफ भाजपा की नजरें टेढ़ी होने की वजह नायडू की कांग्रेस से नजदीकी है। पीएम मोदी खुद आंध्र के मामले पर नजर जमाए हुए थे। उन्होंने वित्त मंत्री अरूण जेटली को निर्देश भी दिए थे कि वे आंध्र के राहत पैकेज मामले का हल निकालें। 

मगर इसी बीच राष्ट्रपति अभिभाषण के वक्त पीएम मोदी जब विपक्ष को जवाब दे रहे थे तब टीडीपी सांसदों ने न सिर्फ जमकर हंगामा काटा था बल्कि वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के इशारे पर चलते आए। पीएम मोदी को टीडीपी सांसदों का यह दोहरा आचरण रास नहीं आया। पीएम ने अपने संबोधन में टीडीपी के गठन का इतिहास बताकर नायडू को आड़े हाथ लिया था। लेकिन टीडीपी के रूख में कुछ बदलाव नजर नहीं आया। 

यही वजह है कि सरकार ने टीडीपी के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा को लटकाए रखने की रणनीति बनाई है। ताकि उसे सियासी सबक सिखाया जा सके। वैसे भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राम माधव के जरिए टीडीपी को आंध्र प्रदेश में धूल चटाने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। 

टीडीपी के नाराजगी की वजहें
टीडीपी का भाजपा से मोह भंग होने के पीछे दोनों ही दल अलग-अलग दलीलें पेश कर रहे हैं। टीडीपी ने भाजपा और केंद्र सरकार से दूरी बनाने के पीछे आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने को मुद्दा बनाया है। तो सरकार की दलील है कि वह आंध्र के मुख्यमंत्री का शासन सुथरा नहीं है। राज्य के विकास के लिए केंद्र ने भरपूर रकम दिया है। लेकिन प्रदेश सरकार ने सही ढंग से उसका खर्च नहीं किया है। 

बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ कुछ मामलों को केंद्र सियासी रूप से हवा देगा। केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के अनुसार प्रदेश सरकार ने कई योजनाओं की यूटीलाइजेशन सर्टीफिकेट अब तक नहीं भेजा है। इसलिए राशि जारी करने में दिक्कत है। जबकि नायडू तमाम मामलों को दरकिनार कर सूबे को धन आवंटित करने की वकालत कर रहे हैं। केंद्र को इन मामलों में कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की बू भी नजर आ रही है। 

टीडीपी के भीतर भी नजर आ रही बगावत की बू
भाजपा से दूरी बनाकर टीडीपी बेशक केंद्र सरकार के खिलाफ अपना अभियान चल रही है। मगर चंद्रबाबू नायडू की कार्यप्रणाली को लेकर टीडीपी के भीतर भी बगावत की बू नजर आ रही है। सूत्र बताते हैं कि वाई एस चौधरी और गजपति राजू सरीखे सांसद राजग से अलग होने के फैसले से नाराज हैं। उनकी दलील है कि केंद्र से पैकेज लेकर सूबे का विकास हो सकता था। और पहले भी केंद्र ने धन के मामले में कोताही नहीं बरती है। वैसे भी टीडीपी अपने आप घिरती दिख रही है। चार साल तक भाजपा का साथ देने के बाद चुनावी वर्ष में उसे आंध्र के विशेष दर्जे की याद आई है। तमाम सियासी दल इसे राजनीतिक स्टंट ही मान रहे हैं। 
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