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Bharat Jodo Yatra: आखिर दिग्विजय सिंह को क्यों मिली बड़ी जिम्मेदारी? पर्दे के पीछे पूर्व सीएम की यह मंशा

सार

कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का जो रोडमैप बनाया गया है। उसके तहत ये यात्रा तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर से होकर गुजरेगी।
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दिग्विजय सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक परिदृश्य से लगभग ओझल चल रहे मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह फिर से मुख्यधारा में लौटते हुए दिखाई दे रहे है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के लिए दिग्विजय सिंह ही रास्ता तैयार कर रहे है। देश के दक्षिण से उत्तरी कोने तक होने वाली राहुल की इस यात्रा के आयोजन की जिम्मेदारी सिंह को सौंपी गई हैं। इसके पहले दिग्विजय नर्मदा परिक्रमा यात्रा कर मध्यप्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में वापसी करवा चुके है। पदयात्रा का अनुभव ही नहीं छह से ज्यादा प्रदेशो में प्रभारी रहे दिग्विजय को देश की राजनीति समझ भी है। इन्हीं सभी बातों के चलते सिंह को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने की बात सामने आ रही है। 

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अमर उजाला से चर्चा में लेखक और वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते है कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का बतौर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री एक लंबा अनुभव है। इसके अलावा नर्मदा यात्रा में एक यात्री के तौर पर भी उन्हें अच्छा खासा अनुभव है। 2017 में नर्मदा यात्रा के दौरान सिंह को जो भी अच्छे या बुरे अनुभव मिले होंगे। वह जरुर उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा में शामिल किए गए होंगे। जिससे राहुल की यह यात्रा आसान हो सके, क्योंकि बतौर यात्री सिंह को पता है कि एक यात्रा के दौरान कैसी कठिनाई आती है और किस तरह की चुनौतियां सामने होती है। इसके अलावा कैसे जमीनी सतर का इनपुट जुटाया जा सकता है।

क्या विधानसभा चुनावों में रंग ला पाएंगी राहुल की मेहनत?
हालांकि, दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा कोई राजनीतिक यात्रा नहीं थी। वह केवल एक या दो प्रदेश तक सीमित होकर एक आध्यात्मिक यात्रा थी। जो उन्होंने स्वयं के आध्यात्मिक चिंतन के लिए थी। इस दौरान वे साधु संतों से मिलते थे। गांवों में प्रवास करते थे और साधारण भोजन करते थे। सिंह की यात्रा मध्यप्रदेश के करीब 70 से 80 विधानसभा सीटों से होकर गुजरी थी। इसका सीधा फायदा कांग्रेस को 2018 के विधानसभा चुनावों में मिला था, क्योंकि जिस भी क्षेत्र से नर्मदा यात्रा गुजरती थी। वहां के कार्यकर्ता और नेता सिंह से मिलने आ जाते थे। वे सामान्य चर्चा में ही जमीनी हकीकत का जायजा ले लेते थे। साथ ही कांग्रेस की स्थिति का आकलन भी करते थे। कहीं न कहीं 2018 चुनावों में सिंह के इस होमवर्क का नतीजा भी कांग्रेस को मिला। जिससे पार्टी सत्ता पर काबिज हो सकी।
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किदवई कहते है कि राज्यों में जो धार्मिक यात्राएं निकाली जाती है। उनका एक सीमित उद्देश्य और दायरा होता है। इसलिए दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी की यात्राओं के उद्देश्य बहुत ही अलग है। सिंह अपनी यात्रा के दौरान साधु संतों से मिलते और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत करते थे। लेकिन राहुल की यह राजनीतिक यात्रा है। इसमें यह देखना लायक होगा कि राहुल की मेहनत का कांग्रेस को आगामी विधानसभा चुनावों में कैसे फायदा मिलता है। क्योंकि राहुल पूरे देश में मोदी सरकार के खिलाफ भारत जोड़ो के नाम से यात्रा निकाल रहे है। 

सिंह की व्यूह रचना का कोई तोड़ नहीं
लेखक और वरिष्ठ पत्रकार दीपक तिवारी अमर उजाला से चर्चा में कहते है कि दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी में एक अनुभवी राजनेता हैं। वे मध्यप्रदेश में करीब दस वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे है। कार्यकर्ताओं की नब्ज को वह बहुत अच्छे से समझते है। पार्टी के लिए वह जो भी व्यूह रचना तैयार करते है, वह बहुत ही बेजोड़ होती है। जिसका फायदा हमेशा संगठन को मिलता रहा है। पर्दे के पीछे से काम करने के मामले में दिग्विजय सिंह की कोई तुलना नहीं है। किसी भी मुद्दे पर स्पष्ट बोलने के कारण वे जनता में जरूर अलोकप्रिय हुए है। लेकिन आज भी वे कांग्रेस के लिए उपयोगी नेताओं में से एक है। इसलिए राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा के आयोजन समिति के अध्यक्ष की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह को दी गई हैं।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के बाद वे पूरे देश की राजनीति में सक्रिय भूमिका में रहे। मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद है।उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गोवा समेत कई राज्यों के प्रभारी रहे। हिंदी के साथ अंग्रेजी भाषा में भी उनकी अच्छी पकड़ हैं। छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र की राजनीति को भी करीब से समझते है। सभी राज्यों में कार्यकर्ताओं और समर्थकों का एक तगड़ा नेटवर्क है। इसलिए कांग्रेस पार्टी को एक ऐसा नेता की जरूरत थी जो जमीन पर एक्टिव होकर इस यात्रा को कार्डिनेट कर सके।

राजस्थान में भी मिल चुका पायलट को यात्रा का फायदा
दिग्विजय सिंह ने 2018 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नर्मदा यात्रा की थी। जिससे जरिए बीजेपी की हिंदुत्व की पॉलिटिक्स को काउंटर करने का दांव सफल रहा था। इसके अलावा दिग्विजय की छवि एक गंभीर राज नेता की भी बनी थी। ऐसे ही सचिन पायलट ने राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के खिलाफ पूरे प्रदेश में पदयात्रा कर माहौल बनाया था। इसका नतीजा था कि कांग्रेस दोनों ही राज्यों में सरकार बनाने में सफल रही थी। 

चुनावी राज्यों से दूर है कांग्रेस की यह यात्रा
कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा का जो रोडमैप बनाया गया है। उसके तहत ये यात्रा तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़ और जम्मू-कश्मीर से होकर गुजरेगी। गुजरात और हिमाचल प्रदेश जहां इस साल के अंत में चुनाव होने हैं। उन्हें भारत जोड़ो यात्रा में शामिल नहीं किया गया है। हालांकि, कांग्रेस की यात्रा उसी समय राजस्थान से गुजरेगी, जब दोनों ही राज्यों में चुनाव का एलान हो चुका होगा। यूपी में भी पदयात्रा का मैप काफी हल्का रहा है। बिहार, बंगाल और झारखंड से भी ये पदयात्रा नहीं गुजरेगी।

वहीं, अगले साल छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। जहां पद यात्रा नहीं निकाली जाएगी। हालांकि, राजस्थान के सात जिलों में 500 किलोमीटर की यात्रा होगी, जबकि ज्यादातर हिंदी बेल्ट वाले राज्य और पूर्वोत्तर को पूरी तरह से पदयात्रा को जगह नहीं मिली। ऐसे में सवाल ये भी है कि इन राज्यों को पदयात्रा के रूट से दूर क्यों रखा गया है जबकि ये राज्य लोकसभा चुनाव के लिहाज से बेहद अहम हैं।

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