आखिर क्या वजह है कि अपने देश में जब तक कोई आंदोलन उग्र या हिंसक नहीं होता, उस दौरान जानमाल का नुकसान नहीं होता, आगजनी नहीं होती या लोग नहीं मरते तब तक उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता? आखिर क्यों ऐसा होता है कि जब चुनाव करीब होते हैं तो ऐसे तमाम संवेदनशील मसले इस हद तक सतह पर उभर आते हैं कि उन्हें संभाल पाना मुश्किल हो जाता है? चाहे वो जाटों का आंदोलन हो, धर्म और संप्रदाय के सवाल हों या दलितों-पिछड़ों की सुरक्षा जैसे मसले।
अपने देश में न्यायपालिका हो या फिर चुनाव आयोग – ऐसा क्यों माना जाता है कि इनके हर फैसले के पीछे कहीं न कहीं केन्द्र सरकार है या फिर सत्ताधारी पार्टी? ये सवाल नए नहीं हैं, लेकिन बरसों से उठते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दलितों की सुरक्षा के नाम पर 1989 में बने कानून के कुछ प्रावधानों को 20 मार्च को खारिज क्या किया, उसकी मंशा पर गंभीर सवाल उठ गए। हालात किस हद तक बेकाबू हुए, पूरा देश देख रहा है।
सियासत करने वाले अपनी अपनी भाषा बोल रहे हैं, आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, लेकिन सवाल वही है कि क्या ऐसे हालात अचानक पैदा हो गए। क्या लोगों के भीतर इस कदर गुस्सा भर गया है कि उसके ऐसे नतीजे देखने को मिल रहे हैं – कहीं सांप्रदायिक दंगे, तो कहीं दलितों के नाम पर हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़... सरेआम गोली चलाते लोग, हाथों में हथियार लहराते गुंडे और पुलिस-प्रशासन की नाकामी।
याद कीजिए, उस दौर को जब आरक्षण आंदोलन की शुरूआत ही हुई थी। वो सत्तर और अस्सी के दशक का आखिरी दौर था। पिछड़ी जीतियों, दलितों और अनुसूचित जातियों, जनजातियों को आरक्षण देने की मांग ज़ोर पकड़ रही थी। जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में 6 लोगों का आयोग बनाया जिसने 1980 में अपनी सिफारिशें दे दीं। मंडल कमीशन की सिफारिशें 1990 में तत्कालीन वी पी सिंह सरकार ने लागू कीं।
देश में इसके खिलाफ जबरदस्त हिंसक आंदोलन हुए, आत्मदाह की घटनाएं हुईं। लेकिन आरक्षण की व्यवस्था लागू हो गई। उसी दौरान 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून बनाया गया जिसे एससी-एसटी एक्ट के तौर पर जाना जाता है। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने जहां मंडल कमीशन की सिफारिशों को सही करार देते हुए अंतिम तौर पर देश में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था पर मुहर लगा दिया, वहीं दलितों की सुरक्षा के नाम पर बना कानून पूरी तरह अस्तित्व में आ गया।
लेकिन फिलहाल हमारा मकसद आरक्षण की व्यवस्था और इसके कानून की बारीकियों में जाना नहीं बल्कि मौजूदा हालात के पीछे की सियासत को तलाशने की कोशिश करना है। भाजपा की सरकार बनने के बाद से आरक्षण को लेकर कई बयान बीच बीच में आते रहे। खासकर संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस सुझाव की भी खासी चर्चा रही कि देश को जाति और वर्ग में बांटने वाले आरक्षण की व्यवस्था खत्म कर देना चाहिए। संघ का एक बड़ा तबका इसे सही मानता है और आरक्षण की अवधारणा को ही समाज को बांटने वाला बताता है। लेकिन देश की सियासत में बेहद गहराई तक पैठ बना चुकी इस व्यवस्था को खत्म करने के बारे में सोचना भी ऐसी ही किसी अप्रिय स्थिति का अंदेशा देने वाला था, इसलिए सरकार ने ऐसी किसी भी अवधारणा को खारिज किया और भाजपा ने बढ़ चढ़कर दलितों, पिछड़ों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में और आरक्षण की हिमायत में तमाम दलीलें दीं।