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RSS: मस्जिद-मंदिर विवाद पर भागवत की टिप्पणी, पांचजन्य ने कहा- समझदारी से निपटने की अपील की

Tue, 31 Dec 2024 11:10 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

आरएसएस प्रमुख ने हाल ही में देशभर में मंदिर-मस्जिद विवादों के फिर से उठने पर चिंता जताई और कहा कि कुछ लोग, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद, इस तरह के मुद्दों को उठाकर खुद को 'हिंदुओं के नेता' मानने लगे हैं। जिसके बाद देश भर में तमाम कई धार्मिक नेता ने अपनी प्रतिक्रियाएं दी थी।
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मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख - फोटो : ANI
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विस्तार
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आरएसएस से जुड़े एक हिंदी साप्ताहिक ने अपने संपादकीय में कहा है कि, आरएसए प्रमुख मोहन भागवत की हाल की टिप्पणी, जिसमें उन्होंने मस्जिद-मंदिर विवादों के फिर से उभरने पर चिंता जताई थी, इसे 'समाज से एक स्पष्ट अपील' के रूप में देखा गया है कि इस मुद्दे पर 'समझदारी से निपटा जाए'। साप्ताहिक ने इस मुद्दे पर "अनावश्यक बहस और भ्रामक प्रचार" से बचने की चेतावनी दी है।
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आरएसएस प्रमुख ने जताई थी चिंता
आरएसएस प्रमुख ने हाल ही में देशभर में मंदिर-मस्जिद विवादों के फिर से उठने पर चिंता जताई और कहा कि कुछ लोग, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद, इस तरह के मुद्दों को उठाकर खुद को 'हिंदुओं के नेता' मानने लगे हैं। 19 दिसंबर को पुणे में 'भारत: विश्वगुरु' विषय पर बोलते हुए मोहन भागवत ने समावेशी समाज की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि दुनिया को यह दिखाने की जरूरत है कि भारत में शांति और सद्भाव में जीवन यापन संभव है।

स्पष्ट बयान से कई अर्थ निकाले जा रहे- हितेश शंकर
पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने 28 दिसंबर को प्रकाशित संपादकीय में कहा, 'RSS प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान के बाद, मीडिया जगत में तीव्र शब्दों की लड़ाई जैसी स्थिति पैदा हो गई है। या तो यह जानबूझकर बनाई जा रही है। एक स्पष्ट बयान से कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। रोज नई प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।' संपादकीय ने कहा कि मोहन भागवत का बयान 'समाज से इस मुद्दे पर समझदारी से निपटने की एक स्पष्ट अपील' थी। 'यह सही है। मंदिर हिंदुओं के विश्वास के केंद्र हैं, लेकिन उनका राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है। आजकल, मंदिरों से जुड़े मुद्दों पर अनावश्यक बहस और भ्रामक प्रचार को बढ़ावा देना एक चिंताजनक प्रवृत्ति है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र किया है,'।
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'कुछ असामाजिक तत्व कर रहे समाज की भावनाओं का शोषण'
संपादकीय में यह भी कहा गया कि कुछ असामाजिक तत्व, जो खुद को सामाजिक समझदार मानते हैं, सोशल मीडिया पर समाज की भावनाओं का शोषण कर रहे हैं और ऐसे असंगत विचारकों से दूर रहना जरूरी है। संपादकीय में कहा गया है कि भारत एक सभ्यता और संस्कृति का नाम है, जो हजारों वर्षों से विविधता में एकता का सिद्धांत न केवल सिखाता रहा है, बल्कि इसे जीवन में भी अपनाया है। वहीं कुछ तत्व, जो ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मूल्यों से रहित हैं, अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए मंदिरों का प्रचार कर रहे हैं और खुद को हिंदू विचारक के रूप में पेश कर रहे हैं।

'मीडिया में मंदिरों की खोज को सनसनीखेज से पेश करने प्रवृत्ति'
संपादकीय में कहा गया है कि, मीडिया में मंदिरों की खोज को सनसनीखेज तरीके से पेश करना अब शायद एक प्रवृत्ति बन गई है, जो 24 घंटे के समाचार चैनलों और समाचार बाजार की भूख को पूरा करता है। इसके साथ ही संपादकीय ने सवाल किया, 'लेकिन सवाल यह है कि इस तरह के समाचारों और मुद्दों से समाज को क्या संदेश जा रहा है? क्या हम समाज के रूप में इस तरह के मुद्दों को उठाने और इसके परिणामों का सामना करने के लिए तैयार हैं?' बता दें कि, यह संपादकीय उस समय प्रकाशित हुआ, जब इसके सहयोगी प्रकाशन 'ऑर्गनाइजर' ने हाल ही में कहा था कि सोमनाथ से संभल तक यह 'ऐतिहासिक सत्य जानने और सभ्यता के न्याय की लड़ाई' है।
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