इस्रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू छह दिवसीय यात्रा पर भारत पहुंच चुके हैं। उनके स्वागत के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद प्रोटोकॉल तोड़कर उन्हें लेने हवाई अड्डे पर पहुंचे। इसरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की गिनती दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में होती है। लेकिन कम लोगों को पता होगा कि वो सेना के एक जाबांज कमांडो भी रह चुके हैं, और कई ऐसे खतरनाक अभियानों में भी भाग लिया है जिनका लोहा पूरी दुनिया मानती हैं। आइए आपको रूबरू कराते हैं नेतन्याहू की कुछ इन्हीं खूबियों से।
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साल 1949 में तेल अवीव में जन्मे बेंजामिन नेतन्याहू इसरायल के पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म देश की स्थापना के बाद हुआ। इजरायल की स्थापना 1948 में हुई थी।
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तीन भाई बहनों में दूसरे नंबर के नेतन्याहू ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 1967 में देश की सेना को ज्वाइन कर लिया था। जहां वो पांच साल तक खतरनाक सायरट मत्काल नाम की स्पेशल फोर्स के स्पेशल कमांडो रहे।
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इस दौरान नेतन्याहू ने ऑपरेशन इनफर्नो, ऑपरेशन गिफ्ट और ऑपरेशन इसोटॉप सहित कई बड़े सैन्य अभियानों में भाग लिया। इसके अलावा उन्होंने कई वॉर ऑफ अट्रिशन, योम किप्पूर जैसे बड़े युद्धों में इजरायली सेना की ओर से भाग लिया।
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उस दौरान सेना की वर्दी में कमांडों के रूप में नेतन्याहू की आकर्षक तस्वीरें इजरायल के युवाओं के बीच खासी लोकप्रिय हुआ करती थी। खासकर युवतियों के बीच शानदार कद काठी वाले नेतन्याहू का जबरदस्त क्रेज हुआ करता था।
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नेतन्याहू के बड़े भाई योनातन नेतन्याहू भी इजरायली सेना में कैप्टन थे। योनातन दुनिया के सबसे खतरनाक मिशन ऑपरेशन एंटबी को अंजाम देने वाली टीम के कमांडर रहे थे। इसी मिशन के दौरान वह शहीद हो गए थे। उनकी मौत के बाद उनके सम्मान में इस मिशन का नाम ऑपरेशन योनि रख दिया गया था।
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साल 1972 में सेना से अलग होने के बाद नेतन्याहू पढ़ाई करने के लिए अमेरिका चले गए और वहां के प्रतिष्ठित 'मैसाचुऐट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी' से साइंस में ग्रेजुएशन और मास्टर पूरी की।
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पढ़ाई पूरी कर नेतन्याहू वापिस लौटे और भाई योनातन की याद में 'योनातन एंटी टेररिस्ट इंस्टीट्यूट' बनाया। इसके बाद उन्होंने राजनीति का रुख किया और साल 1993 में लिकुड पार्टी के चेयरमैन बन गए। तीन साल बाद ही 1996 में अपनी जबरदस्त लोकप्रियता के चलते वह सबसे कम उम्र में देश की प्रधानमंत्री की कुसी तक पहुंचने में सफल रहे।
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हालांकि तीन साल बाद ही 1999 में हुए आम चुनावों में उन्हें एहुद बराक के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा। जिसके बाद उन्होंने प्राइवेट सेक्टर की ओर रुख कर लिया। हालांकि वह ज्यादा दिन तक राजनीति से दूर नहीं रह सके और साल 2002 में फिर वापिस लौटे और प्रधानमंत्री एरियल शेरोन की सरकार में विदेश और वित्तमंत्री का पद संभाला।
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2009 में हुए आम चुनावों में वह गठबंधन सरकार में दूसरी बार प्रधानमंत्री बने और साल 2013 के चुनावों में पूर्ण बहुमत के साथ तीसरी बार प्रधामनंत्री की कुर्सी तक पहुंचे।
इजरायल में नेतन्याहू की लोकप्रियता का ये आलम है कि साल 2015 में हुए आम चुनावों में एक बार फिर वह प्रधानमंत्री चुन लिए गए। इसके साथ ही चौथी बार प्रधानमंत्री बने नेतन्याहू ने देश के संस्थापक रहे बेन गुरियर के चार बार प्रधानमंत्री बनने के रिकार्ड की बराबरी कर ली।