प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के बीच सितंबर या अक्टूबर में सालाना शिखर वार्ता होगी। माना जा रहा है कि इससे पहले ही भारत-रूस 40 हजार करोड़ रुपये के एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम खरीद सौदे पर हस्ताक्षर कर लेंगे। सिस्टम की कीमतों में अंतर समेत सौदे से जुड़े तमाम पहलुओं पर दोनों पक्षों में सहमति बन गई है।
सूत्रों के मुताबिक, भारत को भरोसा है कि रूस अमेरिका के कुछ प्रावधानों के खिलाफ जाकर इस सौदे पर हस्ताक्षर कर देगा। दरअसल, 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में दखल के आरोप लगाते हुए अमेरिका ने रूस को दंडित करने के लिए कुछ कानूनी प्रावधानों का प्रस्ताव किया था। जनवरी, 2018 में यह प्रावधान लागू होने के बाद अमेरिका उन देशों को अपने सैन्य उपकरण नहीं बेचेगा, जो रूस के साथ रक्षा सौदे करेंगे।
अमेरिकी रक्षा मंत्री ने की थी भारत की पैरवी
हाल में अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने कांग्रेस की सुनवाई में कहा था कि रूस के बहाने भारत पर एस-400 सिस्टम की खरीद को लेकर कोई भी पाबंदी अमेरिका के हित में नहीं होगी। भारत चीन से लगती अपनी 4000 किमी लंबी सीमा के नजदीक वायु रक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए एस-400 सिस्टम खरीद रहा है।
सरकारी स्तर पर सौदा करने वाला चीन पहला देश
चीन रूस के साथ सरकारी स्तर पर सौदा करने वाला पहला विदेशी खरीद बना था। चीन ने 2014 में एस-400 सिस्टम का सौदा किया था, जिसके तहत रूस ने आपूर्ति भी शुरू कर दी है। भारत और रूस के बीच एस-400 सिस्टम के लिए पिछले डेढ़ साल से सौदेबाजी चल रही है। अब सौदे के हर पहलू पर बातचीत पूरी हो चुकी है। एस-400 सिस्टम 400 किमी की दूरी तक तीन तरह की मिसाइलों का प्रक्षेपण कर एकसाथ 36 लक्ष्यों को भेद सकता है।