तीन महीने बाद कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस वजह से दक्षिणी भारत के इस राज्य का माहौल काफी बदल गया है। सभी राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे मे विकास बेशक पहली प्राथमिकता है लेकिन प्रचार को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे पर निशाना साधती हुई नजर आ रही हैं। दोनों प्रतिद्वंदी पार्टियां एक-दूसरे को बीफ बिरयानी और बीफ जनता पार्टी कहकर बुला रही हैं।
कर्नाटक से पहले गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार में हुए विधानसभा चुनावों की शुरुआत सकरात्मक मुद्दे से हुई थी। उन राज्यों में राजनीतिक अभियान की शुरुआत विकास के मुद्दों को लेकर हुई थी। हालांकि बाद के अभियान में निजी हमले और कीचड़ उछालना भी शामिल हो गया था। मगर कर्नाटक ने एक अलग ही तस्वीर पेश की है। इस राज्य में चुनाव प्रचार होने से पहले ही राजनीतिक पार्टियां विकास के मुद्दे से बेपटरी हो गई हैं।
कर्नाटक की बिगड़ती हवा के पीछे दिसंबर में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव हैं। जिसमें प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा किया गया चुनाव प्रचार एक दुर्भावनापूर्ण नोट पर खत्म हुआ था। जहां कांग्रेस ने मोदी को चाय बेचने वाला और नीच आदमी कहा था और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहा था। वहीं भाजपा ने राहुल के हिंदू धर्म पर सवाल खड़े किए थे।
मोदी ने आरोप लगाते हुए कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक पाकिस्तानी दूत के साथ बिना संबंधित अधिकारियों को बताए गुजरात चुनाव से पहले मुलाकात की थी। कर्नाटक में भाजपा ने काफी पहले ही चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। 4 फरवरी को बेंगलुरु में मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की थी। रैली से पहले जब गाय यज्ञ का आयोजन किया था तब कांग्रेस ने इसपर तंज कसते हुए काला जादू बताया था। दोनों ही पार्टियां राज्य के चुनावों को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रही हैं।