बैंडिट क्वीन का नाम सुनते ही लोगों को फूलन देवी की याद आ जाती है। सड़क से संसद तक का सफर तय करने वाली फूलन देवी का जन्म आज ही के दिन यानी 10 अगस्त 1963 को हुआ था। उन्होंने डाकू से सांसद तक का सफर तय किया था। उनका जीवन विवादों में रहा है। एक समय ऐसा था जब डर का दूसरा नाम फूलन देवी हुआ करती थीं। उनके जीवन पर बॉलीवुड के मशहूर निर्देशक शेखर कपूर ने 1994 में बैंडिट क्वीन नाम की फिल्म बनाई है। फिल्म में सीमा बिस्वास ने फूलन का किरदार निभाया था। उस साल फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड, फिल्मफेयर का बेस्ट फिल्म क्रिटिक्स अवॉर्ड और बेस्ट डायरेक्शन का भी अवॉर्ड मिला था। आज हम आपको फूलन देवी के जिंदगी के बारे में कुछ अहम बातें बताते हैं।
- 10 अगस्त 1963 को फूलन देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन के घूरा का पुरवा गांव में हुआ था। उनका परिवार बहुत गरीब था। संपत्ति के नाम पर उनके पास केवल एक एकड़ जमीन थी। 11 साल की उम्र में जब फूलन के चाचा के बेटे माया दीन मल्लाह ने जमीन को कब्जाने की कोशिश की थी तब उन्होंने न केवल इसका विरोध किया बल्कि उसके सिर पर ईंट मार दी थी।
- इस घटना के कुछ महीने बाद ही फूलन के परिवारवालों ने उनकी शादी उम्र में कई साल बड़े पुत्तीलाल मल्लाह से करवा दी। उनकी शादीशुदा जिंदगी कभी खुशहाल नहीं रही। पति उनके साथ मारपीट, गाली-गलौज और शारीरिक शोषण किया करता था। इससे परेशान होकर वह ससुराल से मायके भाग आईं।
- माया दीन मल्लाह अपनी बेइज्जती को नहीं भूला था इसलिए उसने फूलन पर चोरी का आरोप लगा दिया। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करके तीन दिनों तक जेल में रखा। उन्हें काफी मारा-पीटा गया और चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। इसके बाद गौना करके उन्हें फिर ससुराल भेज दिया गया। मगर कुछ महीनों बाद ससुरालवालों ने उन्हें मायके भेज दिया।
- ससुराल वापस आने के बाद फूलन देवी की मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से हुई जो डाकुओं के गैंग से थे। ये लोग उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा बुंदेलखंड में सक्रिय थे। बाद में फूलन देवी उन्हीं के गैंग में शामिल हो गईं और चंबल की मुख्य डाकुओं में से एक बनीं।
- कहा जाता है कि गैंग में दो डाकुओं को फूलन देवी से प्यार हो गया था। हालात ऐसे हो गए कि एक डाकू विक्रम मल्लाह ने दूसरे डाकू बाबू गुज्जर की हत्या कर दी। इसके बाद वह डाकुओं का सरदार बन गया।
- घटना के कुछ हफ्तों बाद डाकुओं ने उसी गांव पर हमला किया जहां फूलन देवी का पति रहता था। उन्होंने खुद पति को घर से बाहर खदेड़ा और गांववालों के सामने उसपर चाकू से हमला करके उसे मरने के लिए सड़क किनारे छोड़ दिया। हालांकि उसकी जान बच गई।
- बाबू गुज्जर की हत्या से ठाकुर गैंग के श्रीराम ठाकुर और लाला ठाकुर बहुत नाराज थे। वह फूलन देवी को इसका जिम्मेदार मानते थे। इसी कारण उन्होंने फूलन को अगवा कर लिया और उन्हें बेहमई गांव ले गए। जहां उनके साथ तीन हफ्ते तक सामूहिक दुष्कर्म किया गया। 1981 में फूलन बेहमई गांव गईं जहा उन्होंने दुष्कर्म करने वाले दो लोगों को पहचान लिया। बाकियों के बारे में पूछने पर जब कोई जवाब वनहीं मिला तो उन्होंने 22 ठाकुरों को गोली मार दी। इस घटना से उनकी चर्चा चारों तरफ होने लगी और मीडिया ने उन्हें बैंडिट क्वीन का नाम दिया गया।
- उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकार के अलावा कई डकैतों के समूह ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की लेकिन उनके हाथ असफलता लगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने 1983 में उनसे समझौता किया कि उन्हें फांसी की सजा नहीं दी जाएगी। जिसके बाद उन्होंने अपने 10 हजार समर्थकों के साथ आत्मसमर्पण किया।
- 11 साल तक जेल में रहने के बाद फूलन देवी को 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने रिहा कर दिया। रिहाई के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। 1994 में उन्होंने उम्मेद सिंह से शादी की थी। 1996 में फूलन ने उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर लोकसभा सीट से चुनाव जीता और संसद भवन पहुंची।
- 25 जुलाई, 2001 को शेर सिंह राणा नाम का एक शख्स फूलन देवी से मिलने पहुंचा और घर के गेट पर ही उन्हें गोली मार दी। फूलन देवी को गोली मार दी। दो गोली उनके सिर पर और दो शरीर पर लगी। शेर सिंह राणा का कहना था कि उसने बहमई हत्याकांड का बदला लिया है। 2014 में शेर सिंह राणा को दिल्ली की एक कोर्ट ने उम्र कैद की सजा सुनाई थी।