इससे पहले जब मामले की सुनवाई हुई तो सरकारी पक्ष ने अर्धसैनिक बलों में प्रतिनियुक्ति पर आईपीएस अधिकारियों को उनके कोटे के पदों पर लगाने के लिए प्रतिबंध हटाने का आग्रह किया था। सरकारी पक्ष का कहना था कि मामले की सुनवाई चलती रहे, लेकिन प्रतिनियुक्ति की इजाजत दे दी जाए। अदालत ने कहा, इतनी जल्दी क्यों है। क्या कोई इमरजेंसी है। इस पर आईपीएस अधिकारियों का कहना था कि वे इन बलों में काम करना चाहते हैं। उनके पास पर्याप्त अनुभव है।
दूसरी ओर कॉडर अफसरों का आरोप है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने खुद सामने न आकर कथित तौर पर कुछ आईपीएस अधिकारियों को सामने कर दिया है। यदि आईपीएस की जगह इन बलों के सौ कमांडेंट को प्रमोशन देकर उन्हें डीआईजी बना दिया जाए तो ये सभी पद भरे जा सकते हैं। ऐसे में जब कमांडेंट डीआईजी बनेंगे तो इतने ही टूआईसी कमांडेंट बन जाएंगे। इसके बाद उतने ही डिप्टी कमांडेंट टूआईसी बन जाएंगे।
इसी तरह 108 सहायक कमांडेंट, डिप्टी कमांडेंट के पद पर तैनात किए जा सकेंगे। सीआरपीएफ के पूर्व आईजी एसएस संधू और वीपीएस पंवार कहते हैं कि इस मामले में केंद्र सरकार टालमटोल की नीति पर चल रही है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के करीब दस हजार मौजूदा अफसर और सैकड़ों पूर्व अफसर प्रमोशन एवं वित्तीय फायदों में हुए भेदभाव को लेकर परेशान हैं। जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है।
करीब बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कॉडर अफसर उस वक्त कमांडेंट के पद तक पहुंच पाता है। कॉडर अफसर 34-35 साल की नौकरी के बाद बड़ी मुश्किल से आईजी बनता है। डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी 'ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। अभी तक सीआरपीएफ, बीएसएफ और दूसरी कई सेवाओं में सर्विस रूल नहीं बनाए गए हैं।
इतना ही नहीं, इन कॉडर अधिकारियों को समय पर गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) और गैर-कार्यात्मक चयन ग्रेड (एनएफएसयू) का लाभ मिल जाए, इसके लिए आरआर यानी रिक्रूटमेंट रूल में भी संशोधन नहीं किया गया। नतीजा, आज बहुत से कॉडर अधिकारी परमोशन और आर्थिक फायदों से वंचित हैं। यही वजह है कि देश के पांच बड़े अर्धसैनिक बलों के अफसर अदालत में पहुंच गए हैं।