राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कमल स्वरूप ने कभी नहीं सोचा होगा कि लोकसभा चुनाव के दौरान बनारस में मोदी और केजरीवाल के बीच हुई जिस राजनीतिक जंग ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था उसे जनता के सामने लाने में उन्हें इतने पापड़ बेलने पड़ेंगे। मोदी-केजरीवाल के बीच उसी रोमांचक राजनीतिक जंग पर बनी उनकी डाक्यूमेंट्री 'डांस फॉर डेमोक्रेसी/बैटल ऑफ बनारस' की रिलीजिंग एक बार फिर लटक गई है।
सेंसर बोर्ड के बाद फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल (FCAT) ने फिल्म को हरी झंडी देने से हाथ खड़े कर दिए हैं। 4 अप्रैल को ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस एसके महाजन ने आदेश जारी करते हुए कहा 90 मिनट की यह डाक्यूमेंट्री फिल्म राजनीतिक पार्टियों के नेताओं द्वारा दिए गए भड़काऊ और नफरत भरे भाषणों से भरी हुई है।
ऐसे में यह विभिन्न जातीय सदस्यों को आपस में बांटने का काम कर सकती है। हालांकि फिल्म के निर्माता इन तर्कों को खारिज करते हैं, वो कहते हैं कि फिल्म लोकसभा चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी-अरविंद केजरीवाल और अन्य दलों के नेताओं के बीच हुई चुनावी जंग की हकीकत से लोगों को रूबरू कराती है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपत्तिजनक लगे या जिससे कोई माहौल खराब हो।
डाक्यूमेंट्री फिल्में आमतौर पर किसी मुद्दे या व्यक्ति विशेष के किसी खास पहलू से लोगों को रूबरू कराती हैं लेकिन कई बार ये सरकार के कोप का भी शिकार बन जाती हैं। इससे पहले भी कई डाक्यूमेट्री फिल्में देश में बैन हो चुकी हैं। डालते हैं उन पर एक नजर।
सिक्किम (1971)
फिल्मकार सत्यजीत रे का नाम फिल्मी दुनिया में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। खास नजरिए के साथ अपनी फिल्मों में समाज का चित्रण करने वाले सत्यजीत रे को ऑस्कर के लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से भी सम्मानित यिका जा चुका है। कम ही लोगों को मालूम होगा कि उनकी बनाई एकमात्र डाक्यूमेंट्री फिल्म को सेंसरशिप का दंश झेलना पड़ा था।
सिक्किम के भारत में विलय पर 1971 में बनी उनकी 'सिक्किम' नाम की डाक्यूमेंट्री फिल्म को तत्कालीन सरकार ने बैन कर दिया था। फिल्म को सिक्किम के अंतिम शासक पालडन तोल्डुप नामग्याल और उनकी अमेरिकन पत्नी होप कुक ने फाइनेंस किया था। चार दशक तक बैन रहने के बाद सरकार ने 2010 में इस फिल्म से बैन उठाया। लेकिन तब तक सत्यजीत रे यह दुनिया छोड़ चुके थे।
फैंटम इंडिया (1969)
फ्रेंच निर्माता लुईस माले द्वारा निर्मित सीरीज डॉक्यूमेंट्री फैंटम इंडिया को भी भारत में बैन कर दिया गया था। अपनी भारत यात्रा के दौरान मद्रास और कलकत्ता में बिताए दिनों पर बनाई उनकी यह सात कडियों की डाक्यूमेंट्री फिल्म उस दौर की गरीबी की स्थिति, जनजाति पिछड़ेपन और जातीय व्यवस्था का सच बयां करती थी।
इसका विरोध करने वालों का कहना था कि यह फिल्म केवल देश के गरीब राज्य और अन्य नकारात्मक पहलुओं का चित्रण करती है। जिससे दुनियाभर में अच्छा संदेश नहीं जाएगा। मामले के राजनीतिक रंग लेने के कारण भारत सरकार को बीबीसी को इसका प्रसारण रोकने का निवेदन करना पड़ा। बीबीसी के इंकार करने पर मामले ने इतना तूल पकड़ा कि सरकार ने उसे दिल्ली स्थित अपना ब्यूरो बंद करने के लिए कह दिया।
द फाइनल सोल्यूशन (2003)
2002 के गुजरात दंगों पर बनी द फाइनल सोल्यूशन भी आज तक रिलीज का इंतजार देख रही है। राकेश शर्मा द्वारा साल 2003 में बनाई गई साढ़े तीन घंटे की इस डाक्यूमेंट्री फिल्म में गुजरात में हुए दंगों की त्रासदी को सामने लाने का प्रयास किया गया है। लेकिन फिल्म इससे पहले की लोगों के सामने आ पाती 2004 में सेंसर बोर्ड ने इसे बैन कर दिया।
बोर्ड की दलील थी कि फिल्म हिंदू और मुस्लिमों के बीच अविश्वास की खाई को और बढ़ा सकती है। हालांकि बाद में फिल्म को हरी झंडी दे दी गई। जिसे साल 2007 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में स्पेशल ज्यूरी अवार्ड से सम्मानित किया गया।
इंशाअल्लाह फुटबाल (2010)
एक युवा कश्मीरी फुटबालर के जीवन पर बनी इस डाक्यूमेंट्री फिल्म को भी सरकार की हरी झंडी नहीं मिल सकी थी। बशरत बशीर बाबा नाम का कश्मीरी युवा ब्राजील में फुटबाल खेलने की इच्छा रखता है लेकिन दो साल के इंतजार के बाद भी उसे पासपोर्ट नहीं मिल सका। इसकी वजह थी उसके पिता का एक पूर्व आतंकवादी होना।
हालांकि सेंसर बोर्ड ने फिल्म को ए सर्टिफिकेट देकर हरी झंडी दे दी थी लेकिन रिलीज से कुछ दिन पहले ही इसे बैन कर दिया गया। फिल्म पर आरोप लगा था कि इसमें कश्मीर घाटी में सेना की भूमिका को गलत तरीके से पेश किया गया था। हालांकि अश्विन कुमार द्वारा निर्मित इस डाक्यूमेंट्री फिल्म ने बाद में राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
नो फायर जोन (2013)
नोबेल के शांति पुरस्कार के लिए नामांकित कालुम मैक्रे निर्देशित नो फायर जोन श्रीलंका और लिट्टे के बीच हुए युद्ध की परिणिति पर बनी थी। फिल्म में निर्देशक ने श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच छिड़े अंतिम युद्ध और उसकी विभिषिका को सामने लाने का प्रयास किया था।
साल 2009 में श्रीलंका की सशस्त्र सेना और लिट्टे के आतंकियों के बीच छिड़े युद्ध के अंतिम दौर की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया था। इसी मुद्दे
पर फिल्म को बैन कर दिया गया। हालांकि 96 मिनट की यह फिल्म इंटरनेट पर हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है।
इंडियाज डॉटर (2014)
साल 2012 की सर्दियों में पूरे देश को हिला देने वाले दिल्ली गैंगरेप पर बनी डाक्यूमेंट्री इंडियाज डॉटर को लेकर भी खूब हल्ला मचा था। बीबीसी की निर्देशक लेस्ली उडविन द्वारा निर्देशित इंडियाज डॉटर में निर्भया के गुनहगारों और उनके परिजनों से बातचीत को दिखाया गया था। उस समय फिल्म पर यह आरोप लगे थे कि इसमें दोषियों के प्रति सहानभूति दिखाने का प्रयास किया गया है।
फिल्म पर मचे विवाद के बाद केन्द्र सरकार ने इसके प्रसारण पर बैन लगा दिया था। फिल्म के पक्ष और विपक्ष में जमकर तर्क दिए गए। मीडिया का भी एक धड़ा जहां फिल्म के रिलीज के पक्ष में था तो दूसरा इस पर बैन लगाने को जायज ठहरा रहा था। हालांकि इस सारे विवाद के बीच बीबीसी ने निर्धारित तिथि से दो दिन पहले ही भारत से बाहर इस फिल्म को रिलीज कर दिया। हाल फिलहाल इस फिल्म को यू
ट्यूब और इंटरनेट पर देखा जा सकता है।