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बाल ठाकरे-वाजपेयी से उद्धव-मोदी तक, उतार-चढ़ाव भरा रहा 30 साल की दोस्ती का सफर

Mon, 11 Nov 2019 03:31 PM IST
Priyesh Mishra न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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BJP Shiv Sena Alliance - फोटो : Social Media
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महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना के बीच चल रहा सियासी संग्राम अब दिल्ली तक पहुंच गया है। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के कारण लगभग 30 साल पहले हुआ यह राजनैतिक गठबंधन अब टूटने के कगार पर पहुंच गया है। लेकिन, यह पहली बार नहीं है कि दोनों पार्टियों में तल्खी इस कदर बढ़ी है कि गठबंधन ही खतरे में दिखाई देने लगा है।

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शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 1989 में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन किया था। भाजपा की तरफ से प्रमोद महाजन ने इस गठबंधन में अहम भूमिका निभाई थी। जिसके बाद भाजपा-शिवसेना ने 1989 का लोकसभा और 1990 का  महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा था।

गठबंधन ने दो साल बाद भी दिखी रार

भाजपा-शिवसेना ने बीच पहली बार तल्खी गठबंधन के दो साल बाद ही देखने को मिली। जब बृहन्मुंबई महानगरपालिका के चुनाव में सीट बटवारे को लेकर दोनों पार्टियों के बीच अनबन हो गई। शिवसेना ज्यादा सीटें चाहती थी इसलिए दोनों ने गठबंधन को तोड़ दिया। 

1995 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव बाद फिर हुए एक

1995 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा और शिवसेना ने मिलकर सरकार बनाई। हालांकि सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा। चुनाव से पहले भाजपा-शिवसेना का गठबंधन नहीं था। लेकिन, नतीजों ने सरकार बनाने के लिए दोनों को मिलने के लिए मजबूर कर दिया था।

अटल सरकार में शिवसेना के तीन सांसद बने मंत्री

महाराष्ट्र में गठबंधन का असर दिल्ली की राजनीति में भी देखने को मिला जब वाजपेयी सरकार में शिवसेना के दो सांसद कैबिनेट मंत्री जबकि एक को राज्य मंत्री बने। बता दें कि तब भी सरकार में रहते हुए शिवसेना भाजपा के बड़े आलोचकों में शुमार रही। बालासाहब राममंदिर, अनुच्छेद 370 समेत कई मुद्दों पर लगातार भाजपा की आलोचना किया करते थे।

1999 में भी ऐसे ही झगड़ती रह गई थी भाजपा-शिवसेना, तब एनसीपी ने मार ली थी बाजी

1999 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम जारी होने के 13 दिनों तक भाजपा-शिवसेना के बीच सरकार बनाने को लेकर जंग जारी रही थी। इसका फायदा एनसीपी और कांग्रेस ने उठाया। उस समय शिवसेना को 69 और भाजपा को 56 सीटें मिली थी। भाजपा गोपीनाथ मुंडे को मुख्यमंत्री बनाना  चाहती थी जिसपर शिवसेना सहमत नहीं थी। 

2004 से 2014 तक केंद्र में विपक्षी पार्टी के तौर पर भाजपा के साथ रही शिवसेना 

2004 में अटल सरकार के चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सत्ता में आई। 10 साल तक शिवसेना ने भाजपा के साथ मिलकर संसद में विपक्षी पार्टी की भूमिका अदा की। राज्य विधानसभा चुनाव भी दोनों दलों ने मिलकर लड़ा था जिसमें भाजपा को 54 जबकि शिवसेना को 62 सीटें मिली थी।  वहीं 2009 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 46 सीटों से संतोष करना पड़ा था।

2014 के विधानसभा चुनाव के पहले तोड़ा गठबंधन लेकिन मिलकर बनाई सरकार

2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान सीटों पर समझौता न होने के कारण दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरीं। हालांकि चुनाव बाद आए परिणाम ने दोनों को एक कर दिया और देवेंद्र फडणवीस के नेतृ्त्व में भाजपा-शिवसेना की सरकार सत्ता में आई। इस सरकार को भी पूरे पांच साल तक शिवसेना नेतृत्व के तीखे व्यंगबाणों का सामना करना पड़ा।

2019 का लोकसभा चुनाव और एक हुए भाजपा-शिवसेना

2018 तक शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे भाजपा के साथ गठबंधन की संभावनाओं से इनकार करते रहे। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच आश्चर्यजनक रूप से गठबंधन हो गया और दोनों पार्टियों ने मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा। जिसके बाद शिवसेना के कोटे से अरविंद सावंत के रूप में एक सांसद को केंद्र में मंत्री पद दिया गया। शुरू में शिवसेना ने एक मंत्री पद का विरोध किया लेकिन भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत के आगे उसकी एक न चली।
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2019 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव, आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक हुए भाजपा-शिवसेना

दोनों पार्टियों ने 2019 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को एक साथ मिलकर लड़ा। हालांकि किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि इतनी तीखी बयानबाजी के बावजूद दोनों पार्टियां महाराष्ट्र में चुनाव से पहले गठबंधन करेंगी। इस चुनाव में भाजपा को 105 सीटे जबकि शिवसेना को 56 सीटों पर जीत मिली।

दोनों पार्टियों में मुख्यमंत्री पद पर फंसा पेंच

चुनाव बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना और भाजपा के बीच में तीखी बयानबाजी हुई। भाजपा जहां मुख्यमंत्री पद अपने पास रखना चाहती है वहीं शिवसेना हर हाल में अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। जिसे लेकर शिवसेना ने अपने एक मात्र मंत्री को मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दिलवा दिया है। अब देखना यह है कि क्या महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाती है या फिर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगेगा।
 
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